बुधवार, 22 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 43)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार

🔴 इस प्रकार के उत्साही तथा सदाशयता पूर्ण चिंतन करते रहने से एक दिन आपका अवचेतन प्रबुद्ध हो उठेगा, आपकी सोई शक्तियां जाग उठेंगी, आप के गुण कर्म स्वभाव का परिष्कार हो जायेगा और आप परमार्थ पथ पर उन्नति के मार्ग पर अनायास ही चल पड़ेंगे। और तब न आपको चिन्ता, न निराश और न असफलता का भय रहेगा न लोक परलोक की कोई शंका। उसी प्रकार शुद्ध-बुद्ध तथा पवित्र बन जायेंगे जिस प्रकार के आपके विचार होंगे और जिन के चिन्तन को आप प्रमुखता दिये होंगे।

🔵 सभी का प्रयत्न रहता है कि उनका जीवन सुखी और समृद्ध बने। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए लोग पुरुषार्थ करते, धन-सम्पत्ति कमाते, परिवार बसाते और आध्यात्मिक साधना करते हैं। किन्तु क्या पुरुषार्थ करने, धन दौलत कमाने, परिवार बसाने और धर्म-कर्म करने मात्र से लोग सुख-शान्ति के अपने उद्देश्य में सफल हो जाते हैं। सम्भव है इस प्रकार प्रयत्न करने से कई लोग सुख शान्ति की उपलब्धि कर लेते हों, किन्तु बहुतायत में तो यही दीखता है कि धन-सम्पत्ति और परिवार परिजन के होते हुए भी लोग दुःखी और त्रस्त दीखते हैं। धर्म-कर्म करते हुए भी असन्तुष्ट और अशान्त हैं। 

🔴 सुख-शान्ति की प्राप्ति के लिए धन-दौलत अथवा परिवार परिजन की उतनी आवश्यकता नहीं है। जितनी आवश्यकता सद्विचारों की होती है। वास्तविक सुख-शान्ति पाने के लिए विचार साधना की ओर उन्मुख होना होगा। सुख-शान्ति न तो संसार की किसी वस्तु में है और न व्यक्ति में। उसका निवास मनुष्य के अन्तःकरण में है। जोकि विचार रूप से उसमें स्थित रहता है। सुख-शान्ति और कुछ नहीं, वस्तुतः मनुष्य के अपने विचारों की एक स्थिति है। जो व्यक्ति साधना द्वारा विचारों को उस स्थिति में रख सकता है, वही वास्तविक सुख-शान्ति का अधिकारी बन सकता है। अन्यथा, विचार साधना से रहित धन-दौलत से शिर मारते और मेरा-तेरा, इसका-उसका करते हुए एक झूठे सुख, मिथ्या शान्ति के मायाजाल में लोग यों ही भटकते हुए जीवन बिता रहे हैं और आगे भी बिताते रहेंगे। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 होशियारी और समझदारी

🔶 होशियारी अच्छी है पर समझदारी उससे भी ज्यादा अच्छी है क्योंकि समझदारी उचित अनुचित का ध्यान रखती है! 🔷 एक नगर के बाहर एक गृहस्थ महात्म...