सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

👉 सच्ची लगन सफलता का मूल

🔵 दक्षिण भारत के एक छोटे-से गाँव की एक कुटिया में बैठा हुआ वह व्यक्ति निरंतर लेखन-कार्य में निमग्न था, उसे न खाने की सुध थी न पानी की। आस-पास, पास-पडो़स मे क्या हो रहा है ? उसे यह भी पता नहीं, कुटिया में कौन आता-जाता है ? भोजन कौन दे जाता ? जूठे पात्रों को कौन उठा ले जाता? बिस्तर कौन संभाल जाता है ? इसका कुछ भी ध्यान नहीं। लेखन के आवश्यक उपकरण कगज, दवात, स्याही आदि कहाँ से आते है? कब आते है ?  कौन लाता है ? इसका कुछ भी भान नहीं है नित्यक्रिया शौच, लघुशंका आदि के उपरात स्नान, ध्यान, भोजन आदि स्वभाववश हो जाते थे। पुनः अपनी लेखनी उठाई और अपनी साधना में निमग्न। प० वाचस्पति जी मिश्र अपने सुप्रसिद्ध वेदांत ग्रंथ "भामती" के प्रणयन मे इस प्रकार निरत थे।

🔴 तन्मयता और सच्ची लगन वह गुण है जो व्यक्ति को उसके निर्दिष्ट लक्ष्य तक पहुँचाते हैं। सफलता के अन्य सूत्र भी हैं उनकी भी आवश्यकता पडती है, परंतु जैसे दीपक जलने के लिये तेल सबसे आवश्यक उपकरण है, वैसे ही सफलता के लिए सच्ची और प्रगाढ़ लगन। मनुष्य में यदि इसका अभाव रहा तो सारे उपकरण रहते हुए भी कुछ नहीं कर सकेंगे। देखने में लगेगा कुछ हो रहा है। ऐसी मनःस्थिति में किये गये लँगडे़ लूले काम भला कहीं सफल होते हैं ?

🔵 पं० वाचस्पति जी मिश्र में ऐसी ही तन्मयता और निष्ठा थी। एक रात को बैठे वे लिख रहे थे अपने ग्रन्थ को। दीपक का तेल समाप्त सा हो रहा था। लौ भी फीकी पड़ रही थी। इतने में दो हाथ उधर से उठे। आशय यह था कि दीपक तेज किया जाय। इसी प्रयत्न में दीपक बुझ गया। उन हाथों ने फिर बत्ती जलाई। संयोग था कि उस समय पंडित जी का ग्रन्थ पूरा हो चला था। अन्यथा अनेक वर्षों तक वे ऐसी बाधाओं को जान भी न सके थे। लिखना और लेखनी बंद करके सोचना बस चिंतन की यह तन्मयता ही उनका जीवन था। दीपक भी कुछ होता है, यह लिखते समय उनके ध्यान में कभी नहीं आया।

🔴 ग्रंथ पूरा हो गया था। सरस्वती के पुत्र का ध्यान भंग हुआ दीपक जलाकर जाती हुई पत्नी को उन्होंने देखा और पूछा-देवि तुम कौन हो ? यहाँ किसलिए आईं थीं ? आप

🔵 मैं आपकी चरण सेविका हूँ। पिछले चालीस-पचास वर्षों से आपकी ही सेवा कर रही हूँ, उस नारी ने विनम्रतापूवंऊ उत्तर दिया- ''आज दीपक बुझ जाने से कार्य में विघ्न पड़ा इसके लिए क्षमा करें। भविष्य में ऐसा कष्ट न आने दूँगी।

🔴 मेरी सेविका ? पंडित जी इसका रहस्य न समझ सके पवित्रता की प्रतिमूर्ति अपने पतिदेव के आश्चर्य का आशय समझ गई वह आगे स्पष्टीकरण करते हुए पुनः बोल उठी "पिता अपनी पुत्री का हाथ जिस पुरुष के हाथ में दे देता है, वह उसकी सेविका ही होती है। आप तो विवाह मंडप में भी हाथों मे कुछ पन्ने लिये हुए
उनके ही चिंतन में लीन थे। इस कुटिया में भी जब से आई आपको अपने लेखन से अवकाश कहाँ ?

🔵 "तो फिर तुम मुझसे क्या चाहती हो ?"

🔴 कभी चाहती थी कि संसार में नाम रखने का कुछ आधार होता किंतु अब तो शरीर भी जर्जर हो चुका, अतः आपकी सेवा सुश्रूभा में ही मुझे परम सुख है।

🔵 तुम्हारा नाम ? पंडित जी ने पूछा- भामती, नन्हा-सा उत्तर था। पंडितजी ने अपनी लेखनी उठाई और उस ग्रंथ के ऊपर लिख दिया- "भामती" बोले, लो संसार में जब तक भारतीय संस्कृति और उसकी गरिमा जीवित रहेगी तुम्हारा नाम अमर रहेगा। सचमुच पंडित वाचस्पति की सच्ची निष्ठा "भामती"  आज भी कायम है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 54, 55

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