सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 64)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔵 उपासना में ऊबने और अरूचि कि अड़चन उन्हें आती है जिनकी आन्तरिक आकांक्षा भौतिक सुख- सुविधाओं को सर्वस्व मानने की है, जो पूजा- पत्री से मनोकामनाएँ पूर्ण करने की बात सोचते रहते हैं उन्हें ही प्रारब्ध और पुरुषार्थ की न्यूनता के कारण अभिष्ठ वरदान न मिलने पर खीझ होती है। आरम्भ में ही आकांक्षा के प्रतिकूल काम में उदासी रहती है। यह स्थिति दूसरों की होती है, सो वे मन न लगने की शिकायत करते रहते हैं। अपना स्तर दूसरा था। शरीर बहाना- भर माना, वस्तुओं को निर्वाह की भट्ठी जलाने के लिए ईंधन भर समझा। महत्त्वाकाँक्षाएँ बड़ा आदमी बनने और झूठी वाह वाही लूटने की कभी नहीं उठी। जो यही सोचता रहा हम आत्मा हैं, तो क्यों न आत्मोत्कर्ष के लिए, आत्मशान्ति के लिए, आत्मकल्याण के लिए और आत्मविस्तार के लिए जिएँ।

🔴  शरीर और अपने को जब दो भागों में बाँट दिया। शरीर के स्वार्थ और अपने स्वार्थ अलग बाँट दिए तो तो अज्ञात की एक भारी दीवार अपने आप गिर पड़ी और अंधेरे से उजाला हो गया। उपासना में ऊबने और अरुचि की अड़चन उन्हें आती है जिनकी आन्तरिक आकांक्षा भौतिक सुख- सुविधाओं को सर्वस्व मानने की है, जो पूजा- पत्री को मनोकामनाएँ पूर्ण करने की बात सोचते रहते हैं उन्हें ही प्रारब्ध और पुरुषार्थ की न्यूनता के कारण अभिष्ट वरदान न मिलने पर खीझ होती है। आरम्भ में ही आकांक्षा के प्रतिकूल काम में उदासी रहती है।

🔵 यह स्थिति दूसरों की होती है, सो वे मन न लगने की शिकायत करते रहते हैं। अपना स्तर दूसरा था। शरीर बहाना- भर माना, वस्तुओं को निर्वाह की भट्टी जलाने का ईंधन भर समझा। महत्त्वाकांक्षाएँ बड़ा आदमी बनने और झूठी वाह वाही लूटने की कभी नहीं उठी। जो यही सोचता रहा हम आत्मा हैं, तो क्यों न आत्मोत्कर्ष के ली, आत्मशान्ति के लिए, आत्मकल्याण के लिए और आत्मविस्तार के लिए जिएँ। शरीर और अपने को जब दो भागों में बाँट दिया। शरीर के स्वार्थ और अपने स्वार्थ अलग बाँट दिए तो वह अज्ञात की एक भारी दीवार अपने आप गिर पड़ी और अंधेरे से उजाला हो गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamari_jivan_saadhna.2

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