शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

👉 नियमबद्धता और कर्तव्य-परायणता-बड़प्पन का आधार

🔴 मैसूर के दीवान की हैसियत से ये राज्य का दौरा कर रहे थे। एक गाँव में वे अकस्मात् बीमार पड गये। ऐसा तेज ज्वर चडा कि दो दिन तक चारपाई से न उठ सके। गांव के डॉक्टर को बीमारी का पता चला तो भागा-भागा आया और उनकी देखभाल की। उसके अथक परिश्रम से वे अच्छे हो गये।

🔵 डॉक्टर चलने लगे तो उन्होंने २५ रुपये का एक चेक उनकी फीस के बतौर हाथ में दिया। डॉ० हाथ जोडकर खडा हो गया और कहने लगा साहब! यह क्तो मेरा सौभाग्य था कि आपकी सेवा करने का अवसर मिला। मुझे फीस नही चाहिए।

🔴 चेक हाथ में थमाते हुए उन्होंने कहा बडे आदमी की कृपा छोटों के लिये दंड होती है। आप ऐसे अवसरों पर फीस इसलिये ले लिया कीजिये, ताकि गरीबों की बिना फीस सेवा भी कर सके। ऐसा न किया कीजिए कि दवाएँ किसी और पर खर्च कर पैसे किसी और से वसूल करे।

🔵 यह थी उनकी महानता। जहाँ बडे लोग अपनी सेवा मुफ्त कराने, अनुचित और अधिक सम्मान पाने में बडप्पन मानते हैं, वहाँ उन्होंने परिश्रम, नियमितता और कर्तव्यपालन में ही गौरव अनुभव किया, यदि यह कहा जाए कि अपने इन्ही गुणों से उन्होंने एक साधारण व्यक्ति से उठकर देश के सर्वाधिक ख्याति लब्ध इंजीनियर का पद पाया तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। वे नियम पालन में डॉक्टर के सामने क्या बडे-से-बडे व्यक्ति के सामने भी उतने ही तटस्थ रहे। कभी लचीलापन व्यक्त नहीं किया।

🔴 उन्हें भारत रत्न की उपाधि दी गई। अलंकरण समारोह में उपाधि ग्रहण करने के लिये वे दिल्ली आए। नियम है कि जिन्हें भारतरत्न की उपाधि से विभूषित किया जाता है वे राष्ट्रपति के अतिथि होते है और राष्ट्रपति भवन में ही निवास करते है। उन्हें भी यहीं ठहराया गया। राष्ट्रपति डॉ० राजेंद्र प्रसाद प्रतिदिन उनसे मिलते थे और उनकी सान्निध्यता में हर्ष अनुभव करते।

🔵 एक दिन जब राष्ट्रपति उनसे मिलने गए तो उन्होंने देखा कि वे अपना सामान बांध रहे हैं और जाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होने आते ही पूछा आप यह क्या कर रहे है, अभी तो आपका ठहरने का कार्यक्रम है।

🔴 उन्होंने उत्तर दिया हाँ तो पर अब कहीं दूसरी जगह ठहरना पडेगा। यहाँ का यह तो नियम है कि कोई व्यक्ति तीन दिन से अधिक नहीं ठहर सकता। राष्ट्रपति बोले आप तो अभी यही रुकिए।'' तो उन्होंने कहा नियम के सामने छोटे-बड़े सब एक है। मैं आपका स्नेह पात्र हूँ इस कारण नियम का उल्लंघन करूँ तो सामान्य लोग दुःखी न होंगे क्या और यह कहकर उन्होंने अपना सामान उठाया बाबू जी को प्रणाम किया और वहाँ से चले आए। शेष दिन दूसरी जगह ठहरे पर राष्ट्रपति के बहुत कहने पर भी वहाँ न रुके।

🔵 नियम पालन से मनुष्य बडा़ बने, केवल पद और प्रतिष्ठा पा लेना ही बडप्पन का चिन्ह नहीं। सूर्य चद्रमा तक जब सनातन नियमों की अवहेलना नहीं करते हुए पूज्य और प्रतिष्ठित हैं तो समुचित कर्तव्य और नियमो के पालन से मनुष्य का मूल्य कैसे घट सकता है? 'भले ही काम कितना ही छोटा क्यों न हो?

🔴 वह थे देश के महान इंजीनियर मोक्षगुंडम् विश्वैश्वरैया जिनकी प्रतिष्ठा और प्रशंसा भारतवर्ष ही नही इंगलैंड और अमेरिका तक में होती थी। पद के लिये नहीं वरन् कार्यकुशलता, नियम पालन अनुशासन और योग्यता जैसे गुणों के लिये।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 36, 37

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