शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 56) 19 Feb

🔵 जिस प्रदेश में अपनी निर्जन कुटिया है, उसमें पेड़ पौधों के अतिरिक्त, जलचर, थलचर, नभचर जीव जन्तुओं की भी बहुतायत हैं। जब भ्रमण को निकलते हैं तो अनायास ही उनसे भेंट करने का अवसर मिलता है। आरम्भ के दिनों में वे डरते थे पर अब तो पहचान गये हैं। मुझे अपने कुटुम्ब का ही एक सदस्य मान लिया है। अब न वे मुझ से डरते हैं और न अपने को ही उनसे डर लगता है। दिन-दिन यह समीपता और घनिष्ठता बढ़ती जाती है। लगता है इस पृथ्वी पर ही एक महान् विश्व मौजूद है।

🔴 इस विश्व में प्रेम, करुणा, मैत्री, सहयोग, सौजन्य, सौन्दर्य, शान्ति, सन्तोष, आदि स्वर्ग के सभी चिह्न मौजूद हैं। उससे मनुष्य दूर है। उसने अपनी एक छोटी सी दुनिया अलग बना रखी है—मनुष्यों की दुनिया। इस अहंकारी और दुष्ट प्राणी ने ज्ञान-विज्ञान की लम्बी-चौड़ी बातें बहुत की हैं। महानता और श्रेष्ठता के, धर्म और नैतिकता के लम्बे-चौड़े विवेचन किये हैं। पर सृष्टि के अन्य प्राणियों के साथ उसने जो दुर्व्यवहार किया है उससे उस सारे पाखण्ड का पर्दाफाश हो जाता है जो वह अपनी श्रेष्ठता, अपने समाज और सदाचार की श्रेष्ठता बखानते हुए प्रतिपादित किया करता है।

🔵 आज विचार बहुत गहरे उतर गये, रास्ता भूल गया, कितने ही पशु-पक्षियों को आंखें भर-भर कर देर तक देखता रहा। वे भी खड़े होकर मेरी विचारधारा का समर्थन करते रहे। मनुष्य ही इस कारण सृष्टि का श्रेष्ठ प्राणी नहीं माना जा सकता कि उसके पास दूसरों की अपेक्षा बुद्धि बल अधिक है। यदि बल ही बड़प्पन का चिह्न हो तो दस्यु, सामन्त, असुर, दानव, पिशाच, बेताल ब्रह्म राक्षस आदि की श्रेष्ठता को मस्तक नवाना पड़ेगा।

🔴 श्रेष्ठता के चिन्ह हैं सत्य, प्रेम, न्याय, शील, संयम, उदारता, त्याग, सौजन्य, विवेक, सौहार्द्र। यदि इनका अभाव रहा तो बुद्धि का शस्त्र धारण किये हुए नर-पशु—उन विकराल नख और दांतों वाले हिंस्र पशुओं से कहीं अधिक भयंकर है। हिंस्र पशु भूखे होने पर ही आक्रमण करते हैं। पर यह बुद्धिधारी नर पशु तो तृष्णा और अहंकार के लिए ही भारी दुष्टता और क्रूरता का निरन्तर अभियान करता रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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