बुधवार, 11 जनवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 5) 12 Jan

🌹 अध्यात्म तत्त्वज्ञान का मर्म जीवन साधना

🔴 ‘‘साधना से सिद्धि’’ का सिद्धान्त सर्वमान्य है। देखना इतना भर है कि साधना किसकी की जाय? अन्यान्य इष्टदेवों के बारे में कहा नहीं जा सकता कि उनका निर्धारित स्वरूप और स्वभाव वैसा है या नहीं, जैसा कि सोचा, जाना गया है। इनमें सन्देह होने का कारण भी स्पष्ट है। समूची विश्व व्यवस्था एक है। सूर्य, चन्द्र, पवन आदि सार्वभौम है। ईश्वर भी सर्वजनीन है, सर्वव्यापी भी। फिर उसके अनेक रूप कैसे बने? अनेक आकार-प्रकार और गुण-स्वभाव का उसे कैसे देखा गया? मान्यता यदि यथार्थ है तो उसका स्वरूप सार्वभौम होना चाहिये।         

🔵 यदि वह मतमतान्तरों के कारण अनेक प्रकार का होता है, तो समझना चाहिये कि यह मान्यताओं की ही चित्र-विचित्र अभिव्यक्तियाँ है। ऐसी दशा में सत्य तक कैसे पहुँचा जाय? प्रश्न का सही उत्तर यह है कि जीवन को ही जीवित जाग्रत देवता माना जाये। उसके ऊपर चढ़े कषाय-कल्मषों का परिमार्जन करने का प्रयत्न किया जाये। अंगार पर राख की परत जम जाने पर वह काला-कलूटा दिख पड़ता है, पर जब वह परत हटा दी जाती है तो भीतर छिपी अग्नि स्पष्ट दीखने लगती है। साधना का उद्देश्य इन आवरण आच्छादनों को हटा देना भर है। इसे प्रसुप्ति को जागरण में बदल देना भी कहा जा सकता है। 

🔴 अध्यात्म विज्ञान के तत्त्ववेत्ताओं ने अनेक प्रकार के साधना-उपचार बताये हैं। यदि गम्भीरतापूर्वक उनका विश्लेषण-विवेचन किया जाय तो प्रतीत होगा कि यह प्रतीक पूजा और कुछ नहीं। मात्र आत्मपरिष्कार का ही बालबोध स्तर का प्रतिपादन है। पात्रता और प्रखरता का अभिवर्द्धन ही योग और तप का लक्ष्य है। पात्रता एक चुम्बक है जो अपने उपयोग की वस्तुओं-शक्तियों को अपनी ओर सहज ही आकर्षित करती रहती है। मनुष्य में विकसित हुए देवत्व का चुम्बक संसार में संव्याप्त शक्तियों और परिस्थितियों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। जलाशय गहरे होते हैं। सब ओर से पानी सिमटकर इकठ्ठा होने के लिये उनमें जा पहुँचता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 धैर्य से काम

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