रविवार, 8 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 18)

🌞  हिमालय में प्रवेश

ठण्डे पहाड़ के गर्म सोते

🔵 जो पर्वत अपनी शीतलता को अक्षुण्य बनाए रहना चाहते हैं उन्हें इस प्रकार की गन्धक जैसी विषैली पर्तो को बाहर निकाल फेंकना चाहिए। एक दूसरा कारण इन तप्त कुण्डों का और भी हो सकता है कि शीतल पर्वत अपने भीतर के इस विकार को निकाल- निकाल कर बाहर फेंक रहा हो और अपनी दुर्बलता को छिपाने की अपेक्षा सबके सामने प्रकट कर रहा हो- जिससे उसे कपटी और ढोंगी न कहा जा सके। दुर्गुणों का होना बुरी बात है, पर उन्हें छिपाना उससे भी बुरा हैं- इस तथ्य को यह पर्वत जानते हैं यदि मनुष्य भी इसे जान लेता तो कितना अच्छा होता।

🔴 यह समझ में आता है वि हमारे जैसे ठंडे स्नान से खिन्न व्यक्तियों की गरम जल से स्नान कराने की सुविधा और आवश्यकता का ध्यान रखते हुए पर्वत ने अपने भीतर बची थोड़ी गर्मी को बाहर निकालकर रख दिया हो। बाहर से तो वह भी ठण्डा हो चला, फिर भीतर कुछ गर्मी बच गई होगी। पर्वत सोचता होगा जब सारा ही ठण्डा हो चला तो इस थोडी- सी गमीं को बचाकर ही क्या करूँगा, इसे भी क्यों न जरूरतमन्दों को दे डालूँ। उस आत्मदानी पर्वत की तरह कोई व्यक्ति भी ऐसे हो सकतें हैं जो स्वयं अभावग्रस्त, कष्टसाध्य जीवन व्यतीत करते हों और इतने पर भी जो शक्ति बची हो उसे भी जनहित में लगाकर इन तप्त कुण्डों का आदर्श उपस्थित करें।

🔵 इस शीतप्रदेश का वह तप्त कुण्ड भुलाये नहीं भूलेगा। मेरे जैसे हजारों यात्री उसका गुणगान करते रहेंगे, उसमे त्याग भी तो असाधारण है। स्वयं ठण्डे रहकर दूसरों के लिए गर्मी प्रदान करना भूखे रहकर दूसरों की रोटी जुटाने के समान है। सोचता हूँ बुद्धिहीन जड़- पर्वत जब इतना कर सकता है तो क्या बुद्धिमान् बनने वाले मनुष्य को केवल स्वाथीं ही रहना चाहिए?    

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हीरों से भरा खेत

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