गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 55)

🌹 कला और उसका सदुपयोग

🔴 80. ईमानदार उपयोगी-स्टोर— ऐसे स्टोर चलाये जांय जहां शुद्ध खाद्य वस्तुएं उचित मूल्य पर मिल सकें। खाद्य पदार्थों की अशुद्धता अक्षम्य है। इससे जन स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव पड़ता है। इस अभाव की पूर्ति कोई ईमानदार व्यक्ति कर सकें तो उससे उनकी अपनी आजीविका भी चले और जनता की आवश्यकता भी पूर्ण हो। आटा, दाल, चावल, तेल, घी, दूध, शहद, गुड़, मेवा, मसाले, औषधियां, चक्की, भाप से पकाने के बर्तन, व्यायाम साधन, साहित्य, पूजा उपकरण एवं अन्य आवश्यक जीवनोपयोगी वस्तुओं का उचित मूल्य पर अभाव पूर्ति करने वाले व्यापारी आज की स्थिति में समाज-सेवी ही कहे जा सकते हैं।

🔵 81. सम्मेलन और गोष्ठियां— सद्भावनाओं को जागृत करने वाला लोक-शिक्षण भी व्यापक रूप से आरम्भ किया जाना चाहिए। इसके लिए समय-समय पर छोटे बड़े सम्मेलन, विचार गोष्ठियां, सत्संग एवं सामूहिक आयोजन करते रहना चाहिए। एकत्रित जन-समूह को विचार देने में सुविधा रहती है और उत्साह भी बढ़ता है। गायत्री यज्ञों के छोटे-छोटे आयोजन भी इस दृष्टि से उपयोगी रहते हैं। बहुत बड़ी सभाओं की भीड़-भाड़ की अपेक्षा विचारशील लोगों के छोटे सम्मेलन अधिक उपयोगी रहते हैं। उनमें ही कुछ ठोस कार्य की आशा की जा सकती है।

🔴 82. नवरात्रि में शिक्षण शिविर— समय-समय पर सद्भावना शिक्षा शिविर होते रहें, इस दृष्टि से आश्विन और चैत्र की नवरात्रियां सर्वोत्तम रहती हैं। उस समय नौ-नौ दिन के शिविर हर जगह किये जाया करें। प्रातःकाल जप, हवन, अनुष्ठान का आयोजन रहे। तीसरे पहर विचार गोष्ठी और भजन कीर्तन एवं रात्रि को सार्वजनिक प्रवचनों का कार्यक्रम रहा करे। अन्तिम दिन जुलूस, प्रभात-फेरी एवं बड़े सामूहिक यज्ञ के साथ पूर्णाहुति, प्रसाद वितरण आदि का कार्यक्रम रहा करे। प्रसाद में सच्चा सत्साहित्य भी वितरण किया जाया करे। बलिदान में बुराइयां छुड़ाई जाया करें। नारी प्रतिष्ठा की दृष्टि से अन्त में कन्या-भोज किया जाया करे। भाषणों और प्रवचनों की आवश्यकता युग-निर्माण की विचारधारा को प्रस्तुत कर सकने वाले कोई भी कुशल वक्ता आसानी से पूरी कर सकते हैं। वर्ष में नौ-नौ दिन के दो नवरात्रि आयोजन शिक्षण शिविरों के रूप में चलते रहें तो इससे उपासना और भावना के दोनों ही महान् लाभों से जन-साधारण को लाभान्वित किया जा सकता है। पर्व और त्यौहारों पर भी इन्हें विकसित बनाने के लिए ऐसे ही आयोजन किये जाते रहने चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भावनाएँ भक्तिमार्ग में नियोजित की जायें (भाग 1)

🔶 भावनाओं की शक्ति भाप की तरह हैं यदि उसका सदुपयोग कर लिया जाय तो विशालकाय इंजन चल सकते हैं पर यदि उसे ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाय तो वह...