गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 1 ) 23 Dec


🔵 गायत्री-उपासना के सन्दर्भ में कई प्रकार की शंकायें उठती रहती हैं। इनका उपयुक्त समाधान न मिलने से, जिस-तिस द्वारा बताये गये भ्रान्त विचारों को ही स्वीकार करना पड़ता है। समय-समय पर प्रस्तुत की जाने वाली शंकाओं में से कुछ समाधान अगले पृष्ठों में प्रस्तुत है।


🌹 गायत्री एक या अनेक

🔴 गायत्री महामंत्र एक है। वेदमाता, भारतीय संस्कृति की जन्मदात्री, आद्यशक्ति के नाम से प्रख्यात गायत्री एक ही है। वही संध्यावन्दन में प्रयुक्त होती है। यज्ञोपवीत संस्कार के समय गुरुदीक्षा के रूप में भी उसी को दिया जाता है। इसलिए उसे गुरुमंत्र भी कहते हैं। अनुष्ठान-पुरश्चरण इसी आद्यशक्ति के होते हैं। यह ब्रह्मविद्या है—ऋतम्भरा प्रज्ञा है। सामान्य नित्य उपासना से लेकर विशिष्टतम साधनाएं इसी प्रख्यात गायत्री मंत्र के माध्यम से होती हैं। इसके स्थान पर या समानान्तर किसी और गायत्री को प्रतिद्वन्द्वी के रूप में खड़ा नहीं किया जा सकता है।

🔵 मध्यकालीन अराजकता के अन्धकार भरे दिनों में उपासना विज्ञान की उठक-पटक खूब हुई है और स्वेच्छाचार फैलाने में निरंकुशता बरती गई है। उन्हीं दिनों ब्राह्मण-क्षत्री-वैश्य वर्ग की अलग-अलग गायत्री गढ़ी गईं। उन्हीं दिनों देवी-देवताओं के नाम से अलग-अलग गायत्रियों का सृजन हुआ। गायत्री महामन्त्र की प्रमुखता और मान्यता का लाभ उठाने के लिए देव वादियों ने अपने प्रिय देवता के नाम पर गायत्री बनाई और फैलाई होंगी। इन्हीं का संग्रह करके किसी ने चौबीस देव-गायत्री बना दी प्रतीत होती हैं।

🔴 देव-मंत्र यदि गायत्री छन्द में बने हों तो हर्ज नहीं, पर उनमें से किसी को भी महामन्त्र गायत्री का प्रतिद्वन्द्वी या स्थानापन्न नहीं बनाया जाना चाहिए और न जाति-वंश के नाम पर उपासना क्षेत्र में फूट-फसाद खड़ा करना चाहिए। देवलोक में कामधेनु एक ही है और धरती पर भी गंगा की तरह गायत्री भी एक ही है। चौबीस अक्षर—आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण—तीन व्याहृतियां—एक ओंकार इतना ही आद्य गायत्री का स्वरूप है। उसी को बिना जाति, लिंग आदि का भेद किये सर्वजनीन-सार्वभौम उपासना के रूप में प्रयुक्त करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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