शनिवार, 31 दिसंबर 2016

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 4) 1 Jan

🌹 प्रतिकूलताएं वस्तुतः विकास में सहायक

🔵 नौकर ने सम्बन्धित विषय पर जो तर्क तथ्य प्रस्तुत किये उससे विवाद समाप्त हुआ। एक विद्वान ने नौकर से पूछा ‘महाशय आपने किस विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की?’ नौकर ने बड़ी ही नम्रता के साथ उत्तर दिया। श्रीमान मैंने कई स्कूलों में शिक्षा प्राप्त की है किन्तु मेरा सबसे अधिक प्रभावशाली शिक्षण विपत्ति रूपी स्कूल में हुआ है।’ यह तेजस्वी बालक ही आगे चलकर ‘जीन जेक रूसो’ के नाम से प्रख्यात हुआ जिसकी क्रान्तिकारी विचारधारा ने प्रजातन्त्र को जन्म दिया।

🔴 प्रसिद्ध विद्वान विलियम कॉवेट अपनी आत्म कथा में लिखा है कि ‘प्रतिकूलताएं मनुष्य के विकास में सबसे बड़ी सहचरी है। आज में जो कुछ भी बन पाया हूं विपन्न परिस्थितियों के कारण ही सम्भव हो सका है। जीवन की अनुकूलताएं सहज ही उपलब्ध होती तो मेरा विकास न हो पाता।’ कावेट के आरम्भिक दिन कितनी कठिनाइयों एवं गरीबी में बीते, यह उसके जीवन चरित्र को पढ़ने पर पता चलता है। वह लिखता है कि ‘‘आठ वर्ष की अवस्था में मैं हल चलाया करता था। ज्ञान अर्जन के प्रति अपार रुचि थी। घर से लन्दन भाग गया तथा सेना में भर्ती हो गया। रहने के लिए एक छोटा सा कमरा मिला जिनमें चार अन्य सैनिक भी रहते थे।

🔵 जो पैसा मिलता था उससे किसी प्रकार दो समय की रोटी जुट जाती थी। मोमबत्ती और तेल खरीदने के लिए पैसा नहीं बचता था। अध्ययन में गहरी रुचि थी। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए मैंने आधा पेट भोजन करना आरम्भ किया। जो पैसा बचता था, उससे स्याही मोमबत्ती कागज खरीद कर लाता था। स्थानीय लाइब्रेरी से पुस्तकें अध्ययन के लिए मिल जाती थीं। कमरे के अन्य सिपाहियों के हंसने बोलने से मुझे निरन्तर बाधा बनी रहती थी किन्तु इसके बावजूद भी मैंने अध्यवसाय का क्रम सतत जारी रखा। समय को कभी व्यर्थ न गंवाया। आज उसी का प्रतिफल है कि मैं वर्तमान स्थिति तक पहुंच सका हूं। जीवन के संघर्षों से मैं कभी घबड़ाया नहीं वरन् उनको विकास का साधन माना।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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1 टिप्पणी:

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