शनिवार, 31 दिसंबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 1 Jan 2017

 🔴 स्वराज्य देने में यों अंग्रेजों ने भी उदारता दिखाई, पर वह संभव तब हुई जब भारतवासियों ने इसके लिए प्रयत्न और पुरुषार्थ किया। यों उचित तो यही है कि शोषक अपने कुमार्ग छोड़े और पिछले पाप का प्रायश्चित करने के लिए जिसको जो क्षति पहुँचाई हैं उसकी क्षतिपूर्ति करें, पर होना ऐसा कम ही है। भलमनसाहत दुनिया में अभी आयी नहीं है। इसलिए व्यवहारतः शोषितों को भी काटना नहीं तो फुफकारना जरूर पड़ता है। अपने अधिकारों की माँग उन्हें इस प्रकार रखनी होती है कि किसी को उसे अस्वीकार करते बन ही न पड़े।

🔵 उपयोगी साहित्य पढ़ते रहने की अभिरुचि हमारे मस्तिष्क, अंतःकरण एवं व्यक्तित्व को निखारती है। उसे आधार पर हम ज्ञान सम्पदा को सुसंपन्न बनाते हैं और अपना स्तर सहज स्वाभाविक क्रम से आगे बढ़ाते हैं। इसलिए यह समझा और समझाया जाना चाहिए कि धन उपार्जन से भी ज्ञान उपार्जन का मूल्य अधिक है। उसके लिए उसी तरह प्रयत्नशील रहा जाना चाहिए जैसे आजीविका उपार्जन के लिए रहते हैं।

🔴 यदि भीतर से ऐसी हूक, टीस, व्याकुलता और तड़फन उठती है कि एक क्षण भी बर्बाद किये बिना हमें ईश्वरीय प्रयोजन के लिए समर्पित जीवन जीना चाहिए, निर्वाह के स्वल्प साधनों से काम चलाना चाहिए और अपनी सारी क्षमताएँ एवं विभूतियाँ जीवन लक्ष्य की पूर्ति में नियोजित कर देनी चाहिए, इस प्रकार के ज्ञान का उदय ही आत्म-बोध, आत्म-साक्षात्कार अथवा ईश्वर-दर्शन कहा जाता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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