शनिवार, 17 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 37) 18 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा

🔵 परमार्थ का यह कार्य अनेक रीतियों से किया जाता है। उन रीतियों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण रीति यह भी है कि मनुष्यों में सत् तत्व की वृद्धि की जाय। यही रीति सर्वोपरि है। किसी को अन्न जल वस्त्र आदि दान देने की अपेक्षा उसके विचार और कार्यों को उत्तम बना देना अनेक गुना पुण्य है। कारण यह है कि जो व्यक्ति सद्गुणी, सदाचारी और सद्भावी बन जाता है वह सुगन्धित पुष्प की भांति जीवन भर हर घड़ी समीपवर्ती लोगों को शांति प्रदान किया जाता है।

🔴 सज्जन पुरुष एक प्रकार का जीवित और चलता फिरता सदावर्त है जो प्रति दिन प्रचुर परिणाम के आत्मिक भोजन देकर अनेक व्यक्तियों को सच्चा प्राण दान देता है। दस हजार सदावर्त या जलाशय स्थापित करने की अपेक्षा एक पुण्यात्मा मनुष्य तैयार कर देना अधिक सुफल प्रदान करने वाला है।

🔵 अपने परिवार में यदि अच्छी भावना और विचारधारा ओत प्रोत कर दी जाय तो कुटुम्बियों के स्वभाव और चरित्र में सात्विकता की वृद्धि होगी और फिर उसके द्वारा अनेक लोगों को पथ-प्रदर्शन मिलेगा। एक पेड़ के बीज अनेकों नये पौधे उत्पन्न करते हैं और फिर उन नये पौधों को बीज और नये नये पेड़ उपजाते हैं, एक से दस, दस से सौ, सौ से हजार, इस प्रकार यह श्रृंखला फैलती है और आगे निरन्तर बढ़ती ही रहती है। इस प्रकार यदि सत स्वभाव के चार मनुष्य बना दिये गये तो उनका प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हजारों लाखों मनुष्यों पर पड़ता है।

🔴 हरिश्चन्द्र, शिव, दधीचि, शिवाजी, राणाप्रताप आदि की तरह कोई कोई तो ऐसे निकल आते हैं, जिनका शरीर मर जाने पर भी ‘यश शरीर’ जीवित रहता है और लाखों करोड़ों वर्ष तक वह यश शरीर संसार में धर्म भावना का संचार करता रहता है। मनुष्य को सात्विक, उच्च, महान बनाना इतना महान् पुण्य कार्य है जिसकी ईंट पत्थर से बनने वाले छोटे छोटे कार्यों से कोई तुलना नहीं की जा सकती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 Awakening the Inner Strength

🔶 Human life is a turning point in the evolution of consciousness. One who loses this opportunity and does not attempt awakening his in...