शनिवार, 17 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 13) 18 Dec

🌹 संवेदना का सरोवर सूखने न दें  
🔴 संग्रह और उपभोग की ललक-व्याकुलता इन दिनों ऐसे उन्माद के रूप में लोकमानस पर छाई हुई है कि उसके कारण धन ही स्वार्थ सिद्धि का आधार प्रतीत होता है। ऐसी दशा में यदि उलटा मार्ग अपनाने का निर्णय करते बन पड़े तो इसमें आश्चर्य ही क्या?  

🔵 मानवी दिव्य चेतना के लिए इस प्रचलन को अपनाना सर्वथा अवांछनीय है। ऐसा कुछ तो कृमि-कीटक और पशु-पक्षी भी नहीं करते। वे शरीरचर्या के लिए आवश्यक सामग्री प्राप्त करने के उपरान्त, प्रकृति के सुझाए उन कार्यों में लग जाते हैं जिसमें उनका स्वार्थ भले ही न सधता हो, पर विश्व व्यवस्था के सुनियोजन में कुछ तो योगदान मिलता ही है। संग्रह किसी को भी अभीष्ट नहीं, उपभोग में अति कोई नहीं बरतता। सिंह, व्याघ्र तक जब भरे पेट होते हैं तो समीप में ही चरने वाले छोटे जानवरों के साथ भी छेड़खानी नहीं करते। 

🔴 मनुष्य का दरजा इसलिए नहीं है कि वह अपनी विशिष्टता को साधनों के संग्रह एवं उपभोग की आतुरता पर विसर्जित करता रहे। उसके लिए कुछ बड़े कर्तव्य निर्धारित हैं। उसे संयम साधना द्वारा ऐसा आत्म परिष्कार करना होता है, जिसके आधार पर विश्व उद्यान का माली बनकर वह सर्वत्र शोभा-सुषमा का वातावरण विनिर्मित कर सके। जब सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुरूप अपनी गतिविधियाँ अपनाते हैं तो मनुष्य के लिए ऐसी क्या विवशता आ पड़ी है, जिसके कारण उसे अनावश्यक संग्रह और उच्छृंखल उपभोग के लिए आकुल-व्याकुल होकर पग-पग पर अनर्थ सम्पादित करते फिरना पड़े।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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