गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 34)


🌹 सभ्य समाज की स्वस्थ रचना

🔵 47. नैतिक कर्तव्यों का पालन— नैतिक एवं नागरिक कर्तव्यों का पालन, सामाजिक स्वस्थ परम्पराओं का समर्थन, धर्म और नीति के आधार पर आचरण, शिष्ट व्यवहार, वचन का पालन, सहयोग और उदारता का अवलम्बन, ईमानदारी और श्रम उपार्जित कमाई पर सन्तोष, सादगी और सचाई का जीवन—ऐसे ही सद्गुणों को अपनाना चाहिए। मानवता की रीति नीति को अपनाकर हमें सदा सन्मार्ग पर ही चलना चाहिए भले ही इसमें अभावों, असुविधाओं और कठिनाइयों का सामना करना पड़े।

🔴 आलसी नहीं बनना चाहिए और न समय का एक क्षण भी बर्बाद करना चाहिए। श्रम और समय का सदुपयोग यही सफलता के माध्यम हैं। जुआ, चोरी, बेईमानी, रिश्वत, मिलावट, धोखेबाजी जैसे अवांछनीय उपायों से कमाई करके बड़ा आदमी बनने की अपेक्षा ईमानदारी को अपना कर गरीबी का जीवन बिताना श्रेयस्कर समझना चाहिए। इसी अवस्था और गतिविधि को अपनाकर हम अपना और समाज का उत्थान कर सकते हैं, यह भली प्रकार समझ लिया जाय।

🔵 48. सहयोग और सामूहिकता— सहयोगपूर्वक, मिलजुल कर सम्मिलित कार्यक्रम को बढ़ाने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। आर्थिक क्षेत्र में सहयोग समितियों के आधार पर व्यापारिक औद्योगिक एवं उत्पादन के कार्यों को विकसित किया जाय। इसमें पूंजी की कठिनाई रहती है। बड़े पैमाने पर कार्य होने से चीजें सस्ती एवं अच्छी तैयार होती हैं। इससे उत्पादकों को भी लाभ मिलता है। उपभोक्ताओं की भी सुविधा बढ़ती है। कार्यकर्ताओं में पारस्परिक प्रेम भी बढ़ता है व्यक्तिगत स्वार्थ की अपेक्षा सामूहिक लाभ एवं संगठन की भावनाएं विकसित होती हैं।

🔴 पारस्परिक सहयोग के आधार पर ही जीवन के हर क्षेत्र में प्रगति हो सकती है। इसलिए सामूहिकता और संगठन के आधार पर संचालित प्रवृत्तियों में भाग लेना, योग देना और उन्हें बढ़ाना ही उचित है। सहयोग की नीति अपनाकर ही मानव जाति ने अब तक इतनी प्रगति की है। इन भावनाओं में शिथिलता आने से सामाजिक पतन और तीव्रता आने से उत्थान का मार्ग प्रशस्त होता है। इस तथ्य को भली प्रकार हृदयंगम करते हुए सहयोग एवं संगठन की प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

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