गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 21) 2 Dec

🌹 *दुष्टता से निपटें तो किस तरह?*
🔵  व्यक्ति पत्थर का नहीं—मिट्टी का, मोम का है। उसे तर्कों या भावनाओं से प्रभावित करके बदला जा सकता है। यहां तक कि धातुओं को गलाकर भी उसके उपकरण ढाले जा सकते हैं, पत्थर से भी प्रतिमायें गढ़ी जा सकती हैं। इसलिए यह मान बैठना उपयुक्त नहीं कि परिस्थितियों में परिवर्तन न होगा और जिन व्यक्तियों से आज घृणा की जा रही है वे अगले दिनों सुधरने या अनुकूल बनने की स्थिति में न होंगे। वाल्मीकि, अंगुलिमाल, अजामिल जैसे बुरे व्यक्ति जब अच्छे बन सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि जो प्रतिकूलता आज है वह भविष्य में अनुकूलता में न बदल सकेगी।

🔴  यहां किसी को समदर्शी होने की अव्यवहारिक दार्शनिक भूल-भुलैयों में नहीं भटकाया जा रहा है और न यह कहा जा रहा है कि सन्त और दुष्ट की समान सम्मान के साथ आरती उतारी जाय। व्याघ्र-भेड़ियों में, सर्प-बिच्छुओं में एक ही आत्मा विद्यमान मानकर साष्टांग दण्डवत् करते रहने की बात भी यहां नहीं कही जा रही है। बुराई को रोकने और भलाई को बढ़ाने का सिद्धांत जब तक जीवित है तब तक समदर्शी रहने की आशा चन्द्र-सूर्य जैसे देवताओं से तो की जा सकती है, पर विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार का उपाय अपनाने का धर्म सिद्धान्त ही मनुष्य के व्यवहार में आ सकता है।

🔵  क्या बिना घृणा किये किसी को बदला-सुधारा जा सकता है? इसका उत्तर हां में दिया जा सकता है। गांधीजी का सत्याग्रह आन्दोलन, प्रह्लाद का असहयोग इसी आधार पर सफल हुआ था, उसमें बिना प्रतिहिंसा के ही काम चल गया था। रोगी को बचाना और रोग को मारना—यह गलत सिद्धांत नहीं है। यह पूर्णतया शक्य है, कठिन इसलिए प्रतीत होता है, क्योंकि उसका प्रयोग-अभ्यास करने का अवसर हमें मिला नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

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