शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 3) 31 Dec

🌹 प्रतिकूलताएं वस्तुतः विकास में सहायक

🔵 लोग मूर्तिकार को देखने के लिए आतुर हो रहे थे। इतने में स्थानीय आयोजक एक लड़की को पकड़कर लाये जिसके कपड़े जरा-जीर्ण हो रहे थे, और बाल बिखरे वे। रक्षकों ने बताया कि यह लड़की कलाकार का नाम जानती है किन्तु बताती नहीं। स्थानीय कानून के अनुसार गुलाम व्यक्ति कला में कोई रुचि नहीं ले सकता। लड़की की चुप्पी पर उसे जेलखाने में डाल देने का आदेश हुआ। इतने में एक किशोर सामने आया और ‘क्रियो’ नाम से अपना परिचय दिया और दृढ़ता के साथ बोला मैंने कला को भगवान मानकर पूजा की है, आपका कानून यदि अपराध मानता है तो हम अपराधी हैं।

🔴  किशोर की दृढ़ता, अल्पायु में कला के प्रति अपार लगन और कलाकृति के अनुपम सौन्दर्य ने अध्यक्ष पेरी क्लीज को मुग्ध कर दिया कानून की कठोरता हृदय को द्रवीभूत होने से रोक न सकी और पेरी क्लीज ने घोषणा की ‘क्रियो’ दण्ड का नहीं सम्मान और पुरस्कार का पात्र है। हमें यह कानून बदलना होगा जिससे कला देवता का अपमान होता हो। उस दिन से पेरी क्लीज के प्रयत्नों से कानून बदला गया। गरीबी और विपन्न परिस्थितियों में भी किशोर कलाकार की कला के प्रति अपार लगन ध्येय के प्रति दृढ़ निष्ठा ने न केवल उसे विश्व के मूर्धन्य कलाकारों की श्रेणी में पहुंचा दिया वरन् उस कानून में भी परिवर्तन करने के लिए बाध्य किया जो अमानवीय था।

🔵 सच तो यह है कि प्रतिकूलताएं मानवी पुरुषार्थ की परीक्षा लेने आती हैं। और व्यक्तित्व भी अधिक प्रखर परिपक्व विपन्न परिस्थितियों में ही बनता है। लायोन्स नगर में एक भोज आयोजित था। नगर के प्रमुख विद्वान साहित्यकार एवं कलाकार आमन्त्रित थे। प्राचीन ग्रीस की पौराणिक कथाओं के चित्रों के सम्बन्ध में उपस्थित विद्वानों के बीच बहस छिड़ गयी और विवादों का रूप लेने लगी। गृह स्वामी ने इस स्थिति को देखकर नौकर को बुलाया और सम्बन्धित विषय में विवाद को निपटाने के लिए कहा सभी को आश्चर्य हुआ कि भला नौकर क्या समाधान देगा। साथ ही उन्हें अपनी विद्वता का अपमान भी अनुभव हो रहा था। किन्तु नौकर की विश्लेषणात्मक तार्किक विवेचना को सुनकर सभी हतप्रभ रह गये और तत्काल ही अपनी इस गलती का ज्ञान हुआ कि विद्वता प्रतिभा किसी व्यक्ति विशेष की बपौती नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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