शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 25) 31 Dec

🌹 समग्र समाधान—  मनुष्य में देवत्व के अवतरण से

🔴  इस तथ्य को हजार बार समझा और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि मन:स्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। इसलिए यदि परिस्थितियों की विपन्नता को सचमुच ही सुधारना हो, तो जनसमुदाय की मन:स्थिति में दूरदर्शी विवेकशीलता को उगाया, उभारा और गहराई तक समाविष्ट किया जाए। यहाँ यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि मन:क्षेत्र एवं बुद्धि संस्थान भी स्वतन्त्र नहीं हैं। उन्हें भावनाओं, आकांक्षाओं, मान्यताओं के आधार पर अपनी दिशाधारा विनिर्मित करनी होती है। उनका आदर्शवादी उत्कृष्ट स्वरूप अन्त:करण में भाव-संवेदना बनकर रहता है।         

🔵 यही है वह सूत्र, जिसके परिष्कृत होने पर कोई व्यक्ति ऋषिकल्प, देवमानव बन सकता है। यह एक ही तत्त्व इतना समर्थ है कि अन्यान्य असमर्थताएँ बने रहने पर भी मात्र इस अकेली विभूति के सहारे न केवल अपना वरन् समूचे संसार की शालीनता का पक्षधर कायाकल्प किया जा सकता है। इक्कीसवीं-सदी के साथ जुड़े उज्ज्वल भविष्य का यदि कोई सुनिश्चित आधार है तो वह एक ही है कि जन-जन की भाव-संवेदनाओं को उत्कृष्ट, आदर्श एवं उदात्त बनाया जाए। इस सदाशयता की अभिवृद्धि इस स्तर तक होनी चाहिए कि सब अपने और अपने को सबका मानने की आस्था उभरती और परिपक्व होती रहे।

🔴 सम्पदा संसार में इस अनुपात में ही विनिर्मित हुई है कि उसे मिल-बाँटकर खाने की नीति अपनाकर सभी औसत नागरिक स्तर का जीवन जी सकें। साथ ही बढ़े हुए पुरुषार्थ के आधार पर जो कुछ अतिरिक्त अर्जन कर सकें, उससे पिछड़े हुओं को बढ़ाने, गिरते हुओं को उठाने एवं समुन्नतों को सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन हेतु प्रोत्साहित कर सकें।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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