सोमवार, 5 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 24) 5 Dec

🌹 गृहस्थ योग से परम पद

🔵 लोग ऐसा समझते हैं कि धर्म-धारणा के लिए, पुण्यफल प्राप्त करने के लिए, आत्मोन्नति के लिए, ईश्वर प्राप्ति के लिए, स्वर्ग या मुक्ति की उपलब्धि के लिए, किन्हीं विशिष्ट, विचित्र या असाधारण कार्यों का आयोजन करने की आवश्यकता होती है। अमुक  प्रकार की वेश-भूषा, अमुक प्रकार का रहन-सहन, अमुक प्रकार का साधन भक्तिप्रद हैं यह मानना बिल्कुल गलत है। वेश-भूषा, रहन-सहन, साधक की सुविधा के लिए है, जिससे उसे आसानी रहे, इनके द्वारा सिद्धि किसी को नहीं मिलती। यदि वेष या रहन-सहन से ही सिद्धि मिलती होती तो आज के साधु नामधारी लाखों कर्महीन भिखमंगे इधर-उधर मारे मारे फिरते हैं मुक्ति के अधिकारी हो गये होते।

🔴 अनेक प्रकार की आत्मिक साधनाऐं, अनेक प्रकार के मानसिक व्यायाम हैं जिनके द्वारा मनोभूमि को, भावना-क्षेत्र को निर्मल, पवित्र एवं सात्विक बनाया जाता है। आत्मोन्नति की असंख्यों साधनाऐं हैं सभी लाभप्रद हैं; क्योंकि किसी भी रास्ते से सही भावना को उच्च बनाना है, यदि मनोभूमि उच्च न बने तो साधना निरर्थक है। साधना एक औजार मात्र है। उसको विवेकपूर्वक काम में लाने से इच्छित वस्तु का निर्माण हो सकता है। पर यदि विवेकपूर्वक न किया हो तो साधक निरर्थक है। अमुक पुस्तक का पाठ करने, मन्त्र जपने या अभ्यास करने से यदि मनोभूमि निर्मल बनती हो तो आत्मोन्नति होगी पर रूढ़ि की तरह अन्धविश्वासपूर्वक अविवेक के साथ किसी मन्त्र या पुस्तक को रटते रहा जाय, अमुक प्रकार से काया-कष्ट सहते रहा जाय तो उससे कुछ प्रयोग सिद्ध नहीं होता।

🔵 जीवन-लक्ष्य को प्राप्त करना आत्मिक प्रगति द्वारा ही संभव है। उस पवित्रता के लिये अनेकों असंख्यों साधन हैं। जिनमें से देश, काल, पात्र को देखते हुए बुद्धिमान व्यक्ति अपने लिए उपयुक्त वस्तु चुन लिया करते हैं। जैसे एक ही कसरत सबके लिए अनिवार्य नहीं है उसी प्रकार एक ही साधन हर ममक्ष के लिये आवश्यक नहीं है। शरीर, ऋतु, खुराक, पेशा आदि को देखकर ही चतुर व्यायाम विशारद अपने शिष्यों को भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यायाम कराते हैं, उसी प्रकार आत्म-तत्वदर्शी आचार्य भी असंख्यों योगों में से उपयुक्त योग का अपने अनुयायियों के लिए चुनाव करते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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