सोमवार, 5 दिसंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 37)

🌹 इन कुरीतियों को हटाया जाय

🔵 पिछले दो हजार वर्ष के अज्ञान से भरे अन्धकारयुग में हमारी कितनी ही उपयोगी प्रथाएं- रूढ़िवादिता में ग्रस्त होकर अनुपयोगी बन गई हैं। इन विकृतियों को सुधार कर हमें अपनी प्राचीन वैदिक सनातन स्थिति पर पहुंचने का प्रयत्न करना होगा, तभी भारतीय समाज का सुविकसित समाज जैसा रूप बन सकेगा। इस संबन्ध में हमें निम्न प्रयत्न करने चाहिए।

🔴 51. वर्ण व्यवस्था का शुद्ध-स्वरूप— ब्रह्माजी ने अपने चार पुत्रों को चार कार्य-क्रम सौंपकर उन्हें चार वर्णों में विभक्त किया है। ज्ञान, धर्म, बल और श्रम यह चारों ही शक्तियां मानव समाज के लिए आवश्यक थीं। इनकी आवश्यकता की पूर्ति के लिए वंशगत प्रयत्न चलता रहे और उसमें कुशलता तथा परिष्कृति बढ़ती रहे, इस दृष्टि से इन चार कामों को चार पुत्रों में बांटा गया था। चारों सगे भाई थे, इसलिए उनमें ऊंच-नीच का कोई प्रश्न न था। किसी का सम्मान, महत्व और स्तर न न्यून था, न अधिक। अधिक त्याग-तप करने के कारण, अपनी आन्तरिक महानता प्रदर्शित करने के कारण ब्राह्मण की श्रेष्ठता तो रही पर अन्य किसी वर्ण को हेय या निम्न स्तर का नहीं माना गया था।

🔵 आज स्थिति कुछ भिन्न ही हैं। चार वर्ण अगणित जातियों-उपजातियों में बांटे गये और इससे समाज में भारी अव्यवस्था एवं फूट फैली। परस्पर एक दूसरे को ऊंचा-नीचा समझा जाने लगा। यहां तक कि एक ही वर्ण के लोग अपनी उपजातियों में ऊंच-नीच की कल्पना करने लगे। यह मानवीय एकता का प्रत्यक्ष अपमान है। व्यवस्थाओं या विशेषताओं के आधार पर वर्ण-जाति रहे, पर ऊंच-नीच की मान्यता को स्थान न मिले। सामाजिक विकास में भारी बाधा पहुंचाने वाले इस अज्ञान को जितना जल्दी हटा दिया जाय उतना ही अच्छा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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