शनिवार, 3 दिसंबर 2016

👉 *गृहस्थ-योग (भाग 23) 4 Dec*

🌹 *गृहस्थ योग से परम पद*

🔵 इन प्रश्नों की मीमांसा करते हुए पाठकों को यह बात भली प्रकार हृदयंगम कर लेनी चाहिए कि— पुण्य का पैसे से कोई सम्बन्ध नहीं है। पुण्य तो भावना से खरीदा जाता है। आध्यात्मिक क्षेत्र में रुपयों की तूती नहीं बोलती वहां तो भावना की प्रधानता है। दम्भ, अहंकार, नामवरी, वाहवाही, पूजा, प्रतिष्ठा के प्रदर्शन के लिए धर्म के नाम पर करोड़ रुपये खर्च करने पर भी उतना पुण्य फल नहीं मिल सकता जितना कि आत्म-त्याग, श्रद्धा एवं सच्चे अन्तःकरण से रोटी का एक टुकड़ा देने पर प्राप्त होता है।

🔴 स्मरण रखिये—सोने की सुनहरी चमक और चांदी के मधुर चमचमाहट आत्मा को ऊंचा उठाने में कुछ विशेष सहायक नहीं होती। आत्मिक क्षेत्र में गरीब और अमीर का दर्जा बिल्कुल बराबर है, वहां उसके पास समान वस्तु है—समान साधन है। भावना हर अमीर गरीब को प्राप्त है, उसी की अच्छाई बुराई के ऊपर पुण्य-पाप की सारी दारोमदार है। घटनाओं का घटाटोप, चौंधिया देने वाला प्रदर्शन, बड़े-बड़े कार्यों के विराट आयोजन रंगीन बादलों से बने हुए आकाश चित्रों की भांति मनोरंजक तो हैं पर उनका अस्तित्व कुछ नहीं।

🔵 सच्चे हृदय से किये हुए एक अत्यन्त छोटे और तुच्छ दीखने वाले कार्य का जितना महत्व है उतना दम्भपूर्ण किये हुए बड़े भारी आयोजन का किसी प्रकार नहीं हो सकता। ‘‘भावना की सच्चाई और सात्विकता के साथ आत्म-त्याग और कर्तव्य पालन’’ यही धर्म का पैमाना है। इस भावना से प्रेरित होकर काम करना ही पुण्य है। सद्भावना जितनी ही प्रबल होगी आत्म-त्याग उतना ही बड़ा होगा। पैसे वाला अपने पैसे को लगावेगा, जी खोलकर सत्कार्य में लगावेगा, इसी प्रकार गरीब के पास जो साधन हैं उसको ईमानदारी के साथ खर्च करेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 Awakening the Inner Strength

🔶 Human life is a turning point in the evolution of consciousness. One who loses this opportunity and does not attempt awakening his in...