रविवार, 25 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 21) 26 Dec

🌹 समग्र समाधान—  मनुष्य में देवत्व के अवतरण से

🔴 पदार्थ-सम्पदा की उपयोगिता और महत्ता कितनी ही बढ़ी-चढ़ी क्यों न हो, पर यदि उसका दुरुपयोग चल पड़े तो अमृत भी विष बनकर रहता है। कलम बनाने के काम आने वाला चाकू किसी के प्राण हरण का निमित्त कारण भी बन सकता है। बलिष्ठता, सम्पदा, शिक्षा के सम्बन्ध में भी यही बात है। उनके सत्परिणाम तभी देखे जा सकते हैं, जब सदुपयोग कर सकने वाली सद्बुद्धि सक्रिय हो। यहाँ इतना और भी समझ लेना चाहिए कि नीतिनिष्ठा और समाजनिष्ठा का अवलम्बन लेना भी पर्याप्त नहीं है, उसमें भाव-संवेदनाओं का पावन प्रवाह ही भले-बुरे लगने वाले ज्वार-भाटे लाता रहा है।    

🔵 मस्तिष्क आमतौर से सभी के सही होते हैं। पागलों और सनकियों की संख्या तो सीमित ही होती है। फिर अच्छे खासे मस्तिष्क , आदर्शवादी उत्कृष्टता क्यों नहीं अपनाते? उन्हें अनर्थ ही क्यों सूझता रहता है? उनसे सुविधा, प्रसन्नता और प्रगति जैसा कुछ बन पड़ना तो दूर, उलटे संकटों, विपन्नताओं, विभीषिकाओं का ही सृजन होता रहा है। इस तथ्य का पता लगाने के लिए हमें भाव-संवेदनाओं की गहराई में उतरना होगा। यह तथ्य समझना होगा कि अन्त:करण में श्रद्धा, संवेदना की शीतलता, सरसता भरी रहने पर ही सदाशयता का वातावरण बनता है। मानसिकता तो उस चेरी की तरह है, जो अन्त:श्रद्धा रूपी रानी की सेवा में हर घड़ी हुक्म बजाने के लिए खड़ी रहती है।   

🔴 स्पष्ट है कि देवमानवों में से प्रत्येक को अपनी सुविधाओं, मनचली इच्छाओं पर अंकुश लगाना पड़ा है और उससे हुई बचत को उत्कृष्टताओं के समुच्चय समझे जाने वाले भगवान् के चरणों पर अर्पित करना पड़ा है। लोकमंगल के लिए, आत्म परिष्कार के लिए अपनी क्षमता का कण-कण समर्पित करना पड़ा है। इसी मूल्य को चुकाने पर किसी को दैवी अनुग्रह और उसके आधार पर विकसित होने वाला उच्चस्तरीय व्यक्तित्व उपलब्ध होता है। महानता इसी स्थिति को कहते हैं। इसी वरिष्ठता को चरितार्थ करने वाले देवमानव या देवदूत कहलाते हैं। उन्हीं के प्रबल पुरुषार्थों के आधार पर शालीनता का वातावरण बनता और समस्त संसार इसी आधार पर सुन्दर व समुन्नत बन पड़ता है।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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