बुधवार, 28 दिसंबर 2016

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 1) 29 Dec

🌹 प्रतिकूलताएं वस्तुतः विकास में सहायक

🔵 संसार के अधिकांश व्यक्ति परिस्थितियों का रोना रोते रहते हैं और सोचते हैं कि अमुक तरह की अनुकूलताएं मिलें तो वे आगे बढ़ने का प्रयास करे। हर तरह की अनुकूलता का सुअवसर उनके लिए जीवन पर्यन्त नहीं आता और वे पिछड़ी अविकसित स्थिति में ही पड़े रहते हैं। जबकि इसके विपरीत साहसी पुरुषार्थी परिस्थितियों के अपने पक्ष में होने का इन्तजार नहीं करते, अपने बाहुबल एवं बुद्धिबल के सहारे वे स्वयं अपने लिए परिस्थितियां गढ़ते हैं। समय श्रम एवं बुद्धि रूपी सम्पदा के सदुपयोग द्वारा वे सफलता के शिखर पर जा चढ़ते हैं। सामान्य व्यक्ति उन सफलताओं को देखकर आश्चर्य चकित रह जाता है और आकस्मिक दैवी वरदान के रूप में स्वीकार करता है जबकि वे स्वयं के पुरुषार्थ, श्रम और समय के सदुपयोग के बलबूते अर्जित की गई होती हैं।

🔴 दूसरों के सहयोग से एक सीमा तक ही आगे बढ़ा जा सकता है। वास्तविक प्रयास तो स्वयं ही करना पड़ता है। अनुकूलताओं का भी एक सीमा तक ही महत्व है। असली सम्पदा तो हर व्यक्ति को समान रूप से परमात्मा द्वारा प्रदत्त की गई है। शरीर बुद्धि एवं समय लगभग सबको एक समान मिला है। शारीरिक एवं बौद्धिक दृष्टि से मनुष्य मनुष्य के बीच थोड़ा अन्तर हो भी सकता है किन्तु समय रूपी सम्पदा में तो राई रत्ती भर का भी अन्तर नहीं है। 24 घण्टे हर व्यक्ति को मिले हैं। यही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सम्पदा है। यह वह खेत है जिसमें पुरुषार्थ का बीजारोपण करके अनेकों प्रकार के सफलता रूपी फल प्राप्त किये जाते हैं।
🔵 अनुकूलताएं आगे बढ़ने के लिए किन्हीं-किन्हीं को ही जन्मजात प्राप्त होती हैं। अधिकांश तो प्रतिकूलताओं में ही आगे बढ़े और सफलता के उस शिखर पर जा चढ़े जो सामान्य व्यक्ति के लिए असम्भव प्रतीत होती हैं। ऐसे शूरवीरों-जीवट सम्पन्न साहसियों के समय अन्ततः परिस्थितियां भी नतमस्तक होती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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