बुधवार, 30 नवंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 33)

🌹 सभ्य समाज की स्वस्थ रचना

🔵 45. सत्कार्यों का अभिनन्दन— प्रतिष्ठा की भूख स्वाभाविक है। मनुष्य को जिस कार्य में बड़प्पन मिलता है वह उसी ओर झुकने लगता है। आज धन और पद को सम्मान मिलता है तो लोग उस दिशा में आकर्षित हैं। यदि यह मूल्यांकन बदल जाय और ज्ञानी, त्यागी एवं पराक्रमी लोगों को सामाजिक प्रतिष्ठा उपलब्ध होने लगे तो इस ओर भी लोगों का ध्यान जायगा और समाज में सत्कर्म करने की प्रगति बढ़ेगी। हमें चाहिए कि ऐसे लोगों को मान देने के लिए सार्वजनिक अभिनन्दन करने के लिए समय-समय पर आयोजन करते रहें।

🔴 मानपत्र भेंट करना, सार्वजनिक अभिनन्दन, पदक-उपहार, समाचार पत्रों में उन सत्कर्मों की चर्चा, फोटो, चरित्र-पुस्तिका आदि का प्रकाशन हम लोग कर सकते हैं। उन सत्कर्मकर्ताओं को इसकी इच्छा न होना ही उचित है, पर दूसरों को प्रोत्साहन देने और वैसे ही अनुकरण की इच्छा दूसरों में जागृत हो, इस दृष्टि से सत्कर्मों के अभिनन्दन की परम्परा प्रचलित करना ही चाहिए। ऐसे आयोजन हलके कारणों को लेकर या झूठी प्रशंसा में न किए जांय, अन्यथा ईर्ष्या द्वेष की दुर्भावनाएं बढ़ेंगी। सभ्य समाज का निर्माण करने के लिए धन एवं शक्ति को नहीं, आदर्श को ही सम्मान मिलना चाहिए।

🔵  46. सज्जनता का सहयोग— यदि मानवता का स्तर ऊंचा उठाना हो तो सज्जनता के साथ सहयोग की नीति अपनाई जानी चाहिए सज्जनता को यदि सहयोग और प्रोत्साहन न मिले तो वह मुरझा जायगी। इसी प्रकार दुष्टता का विरोध न किया गया तो वह भी दिन-दिन बढ़ती चली जायगी। इसलिए प्रत्येक सभ्य नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपनी नीति ऐसी रखे जिससे प्रत्यक्ष या परोक्ष में सत्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि होती रहे और अनीति को निरुत्साहित होना पड़े।

🔴  परिस्थितिवश यदि दुष्टता का पूर्ण प्रतिरोध संभव न हो, इसमें अपने लिए खतरा दीखता हो तो कम से कम इतना तो करना ही चाहिए कि उनकी हां में हां मिलाने, सम्पर्क रखने या साथ में रहने से बचा जाय, क्योंकि इससे दूसरे प्रतिरोध करने वाले की हिम्मत टूटती है और अनीति का पक्ष मजबूत होता है। संभव हो तो तीव्र संघर्ष, न हो तो दुष्टता से असहयोग तो हर हालत में करने का साहस रखना ही चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

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