बुधवार, 30 नवंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 20) 1 Dec

🌹 *दुष्टता से निपटें तो किस तरह?*

🔵  दुष्टता से निपटने के दो तरीके हैं—घृणा एवं विरोध। यों दोनों ही प्रतिकूल परिस्थितियों एवं व्यक्तियों के अवांछनीय आचरणों से उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रियायें हैं, पर दोनों में मौलिक अन्तर है। विरोध में व्यक्ति या परिस्थिति को सुधारने-बदलने का भाव है। वह जहां संघर्ष की प्रेरणा देता है वहां उपाय भी सुझाता है। स्थिति बदलने में सफलता मिलने पर शान्त भी हो जाता है। कई बार ऐसा भी होता है कि भ्रान्त सूचनाओं अथवा मन की साररहित कुकल्पनाओं से ही अपने को बुरा लगने लगे और उसका समग्र विश्लेषण किए बिना झगड़ पड़ने की स्थिति बन पड़े।

🔴  वह स्थिति ऐसी भयंकर भी हो सकती है जिसके लिए सदा पश्चाताप करना पड़े। इन बातों को ध्यान में रखते हुए विरोध के पीछे विवेक का भी अंश जुड़ा होता है और उसमें सुधार की, समझौते की गुंजाइश रहती है। बड़ा संघर्ष न बन पड़ने पर अन्यमनस्क हो जाने, असहयोग करने से भी विरोध अपना अभिप्राय किसी कदर सिद्ध कर ही लेता है।

🔵  हमें यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि सम्पर्क क्षेत्र के सभी व्यक्तियों का स्वभाव-आचरण हमारे अनुकूल होगा। जैसा हमने चाहा है, वैसा ही करेंगे—ऐसा तो स्वतन्त्र व्यक्तित्व न रहने पर ही हो सकता है। प्राचीनकाल में दास-दासियों को बाधित करके ऐसी अनुकूलता के लिए तैयार किया जाता था, पर वे भी शारीरिक श्रम करने तक ही मालिकों की आज्ञा मानते थे। मानसिक विरोध बना ही रहता है, उसकी झलक मिलने पर स्वामियों द्वारा सेवकों को प्रताड़ना देने का क्रम आये दिन चलता रहता था।

🔴  अब वह स्थिति भी नहीं रही, लोगों का स्वतन्त्र व्यक्तित्व जगा है और मौलिक अधिकारों का दावा विनम्र या अक्खड़ शब्दों में प्रस्तुत किया जाने लगा है। ऐसी दशा में बाधित करने वाले पुराने तरीके भी अब निरर्थक हो गये हैं। परस्पर तालमेल बिठाकर चलने के अतिरिक्त दूसरा यही मार्ग रह जाता है कि पूर्णतया सम्बन्ध विच्छेद कर लिया जाय। यह मार्ग भी निरापद नहीं है, क्योंकि सामने वाला अपने को अपमानित और उत्पीड़ित अनुभव करता है और जब भी दांव लगता है तभी हानि पहुंचाने के लिए कटिबद्ध हो जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 6)

🔴 यह तो नमूने के लिए बता रहा हूँ। उसकी ऐसी भविष्यवाणियाँ कवितामय पुस्तक में लिपिबद्ध हैं, जिसे फ्रान्स के राष्ट्रपति मितरॉ सिरहाने रखकर...