रविवार, 27 नवंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 30)

🌹 जन-मानस को धर्म-दीक्षित करने की योजना

🔵 38. युग निर्माण के ज्ञान मन्दिर— जगह-जगह ऐसे केन्द्र स्थापित किये जांय जिनका स्वरूप ज्ञान मन्दिर जैसा हो। सद्भावना और सत्प्रवृत्ति की प्रतीक गायत्री माता का सुन्दर चित्र इन केन्द्रों में स्थापित करके, प्रातः सायं पूजा, आरती, भजन, कीर्तन की व्यवस्था करके इन केन्द्रों में मन्दिर जैसा धार्मिक वातावरण बनाया जाय। उसमें पुस्तकालय, वाचनालय रहें। सदस्यों के नित्य प्रति मिलने-जुलने, पढ़ने सीखने और विचार विनिमय करने एवं रचनात्मक कार्यों की योजनायें चलाने के लिये इसे एक क्लब या मिलन मन्दिर का रूप दिया जाय। योजना की स्थानीय प्रवृत्तियों के संचालक के लिये इस प्रकार के केन्द्र कार्यालय हर जगह होने चाहिए।

🔴 39. साधु ब्राह्मण भी कर्तव्य पालें— पंडित, पुरोहित, ग्राम गुरु, पुजारी, साधु, महात्मा, कथा वाचक आदि धर्म के नाम पर आजीविका चलाने वाले व्यक्तियों की संख्या भारतवर्ष में 60 लाख है। इन्हें जन सेवा एवं धर्म प्रवृत्तियों को चलाने के लिये प्रेरणा देनी चाहिए। ईसाई धर्म में करीब 1 लाख पादरी हैं जिनके प्रयत्न से संसार की तीन अरब आबादी में से करीब 1 अरब लोग ईसाई बन चुके हैं। इधर साठ लाख सन्त-महन्तों के होते हुए भी हिन्दू धर्म की संख्या और उत्कृष्टता दिन दिन गिरती जा रही है, यह दुःख की बात है। इस पुरोहित वर्ग को समय के साथ बदलने और जनता से प्राप्त होने वाले मान एवं निर्वाह के बदले कुछ प्रत्युपकार करने की बात सुझाई-समझाई जाय। इतने बड़े जन समाज को केवल आडम्बर के नाम पर समय और धन नष्ट करते हुये नहीं रहने देना चाहिये। यदि यह प्रयत्न सफल नहीं होता है तो धर्म-प्रचार के उत्तरदायित्व को हम लोग मिल जुल कर कंधों पर उठावें, हम में हर व्यक्ति धर्म प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने के लिये कुछ समय नियमित रूप से दिया करे।

🔵 40. वानप्रस्थ का पुनर्जीवन— जिन्हें पारिवारिक उत्तर-दायित्वों से छुटकारा मिल चुका है, जो रिटायर्ड हो चुके हैं या जिनके घर में गुजारे के आवश्यक साधन मौजूद हैं उन्हें अपना अधिकांश समय लोक-हित और परमार्थ के लिये लगाने की प्रेरणा उत्पन्न हो, ऐसा प्रयत्न किया जाय। वानप्रस्थ आश्रम पालन करने की प्रथा अब लुप्त हो गई है। उसे पुनः सजीव किया जाय। ढलती आयु में गृहस्थ के उत्तरदायित्वों से मुक्त होकर लोग घर में रहते हुए लोकसेवा में अधिक समय दिया करें तो सन्त-महात्माओं और ब्राह्मण पुरोहितों का आवश्यक उत्तरदायित्व किसी प्रकार अन्य लोग अपने कंधे पर उठाकर पूरा कर सकते हैं। वानप्रस्थ की पुण्य परम्परा का पुनर्जागरण युग-निर्माण की दृष्टि से नितांत आवश्यक है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 हीरों से भरा खेत

🔶 हफीज अफ्रीका का एक किसान था। वह अपनी जिंदगी से खुश और संतुष्ट था। हफीज खुश इसलिए था कि वह संतुष्ट था। वह संतुष्ट इसलिए था क्योंकि वह ...