रविवार, 27 नवंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 17) 28 Nov

🌹 *विवेक ही हमारा सच्चा मार्गदर्शक*

🔵  विवेकशीलता को ही सत्य की प्राप्ति का एकमात्र साधन कहा जा सकता है। सत्य को नारायण कहा गया है, भगवान का सर्वाधिक सारगर्भित नाम सत्यनारायण है। यथार्थता के हम जितने अधिक निकट पहुंचते हैं भगवान के सान्निध्य का, उसके दर्शन का उतना ही लाभ लेते हैं। हीरा पेड़ों पर फूल की तरह लटका नहीं मिलता, वह कोयले की गहरी खदानें खोदकर निकालना पड़ता है। सत्य किसी को अनायास ही नहीं मिल जाता, उसे विवेक की कुदाली से खोदकर निकालना पड़ता है।

🔴  दूध और पानी के अलग कर देने की आदत हंस में बताई जाती है। इस कथन में तो अलंकार मात्र है, पर यह सत्य है कि विवेक रूपी हंसवृत्ति उचित और अनुचित के चालू सम्मिश्रण में से यथार्थता को ढूंढ़ निकालती है और उस पर चढ़े हुए कलेवर को उतार फेंकती है।
शरीर की आंतरिक स्थिति का सामान्यतः कुछ भी पता नहीं चलता, पर रक्त ‘एक्सरे’ मल-मूत्र आदि के परीक्षण से उसे जाना जाता है। सत्य और असत्य का विश्लेषण करने के लिए विवेक ही एकमात्र परीक्षा का आधार है। मात्र मान्यताओं, परम्पराओं, शास्त्रीय आप्त वचनों से वस्तुस्थिति को जान सकना अशक्य है।

🔵  धर्मक्षेत्र का पर्यवेक्षण किया जाये तो पता चलता है कि संसार में हजारों धर्म सम्प्रदाय मत-मतान्तर प्रचलित हैं। उनकी मान्यतायें एवं परम्परायें एक दूसरे के सर्वथा विपरीत हैं, नैतिकता के थोड़े से सिद्धान्तों पर आंशिक रूप से वे जरूर सहमत होते हैं बाकी सृष्टि के इतिहास से लेकर ईश्वर की आकृति-प्रकृति अन्त उपासना तक के सभी प्रतिपादनों में घोर मतभेद है। प्रथा परम्पराओं के सम्बन्ध में कोई तालमेल नहीं, ऐसी दशा में किस शास्त्र को, किस अवतार को सही माना जाय—यह निर्णय नहीं हो सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

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