सोमवार, 28 नवंबर 2016

👉 *गृहस्थ-योग (भाग 18) 29 Nov*

🌹 *गृहस्थ धर्म तुच्छ नहीं है*

🔵  मुद्दतों से शिक्षा, दीक्षा, अनुभव एवं सामाजिक कार्य क्षेत्र से पृथक एक छोटे पिंजड़े से घर में जीवन भर बन्द रहने और अपने जैसी अन्य मूर्खाओं की संगति मिलने के कारण वे बेचारी व्यावहारिक ज्ञान में बहुत कुछ पिछड़ गई हैं तो भी उनमें आत्मिक सद्गुण पुरुषों की अपेक्षा बहुत अधिक विद्यमान है। उनके सान्निध्य में नरक, पतन, माया, बन्धन जैसे किसी संकट के उत्पन्न होने की आशंका नहीं है। सच तो यह है कि उनके पवित्र अंचल की छाया में बैठकर पुरुष अपनी शैतानी आदतों से बहुत कुछ छुटकारा पा सकता है उनकी स्नेह गंगा के अमृत जल का आचमन करके अपने कलुष कषायों से, पाप तापों से छुटकारा पा सकता है।

🔴  जिनका अन्तःकरण पवित्र है वे कोमलता की अधिकता के कारण स्त्री में और भी अधिक सत् तत्व का अनुभव करते हैं। हजरत मुहम्मद साहब कहा करते थे कि ‘‘मेरी स्वर्ग मेरी माता के पैरों तले है’’ महात्मा विलियम का कथन है कि ‘‘ईश्वर ने स्त्री के नेत्रों में दो दीपक रख दिए हैं ताकि संसार में भूले भटके लोग उसके प्रकाश में अपना खोया हुआ रास्ता देख सकें’’ तपस्वी लोवेल ने एक बार कहा था ‘‘नारी का महत्व में इसलिए नहीं मानता कि विधाता ने उसे सुन्दर बनाया है, न उससे इसलिये प्रेम करता हूं कि वह प्रेम के लिये उत्पन्न की गई है। मैं तो उसे इसलिये पूज्य मानता हूं कि मनुष्य का मनुष्यत्व केवल उसी में जीवित है।’’ दिव्यदर्शी टेलर ने अपनी अनुभूति प्रकाशित की थी कि— ‘‘स्त्री की सृष्टि में ईश्वरीय प्रकाश है। वह एक मधुर सरिता है जहां मनुष्य अपनी चिन्ताओं और दुखों से त्राण पाता है।’’

🌹  क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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