सोमवार, 28 नवंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 18) 29 Nov

🌹 *विवेक ही हमारा सच्चा मार्गदर्शक*

🔵  प्रत्येक सम्प्रदाय के अनुयायी अपने मार्गदर्शकों के प्रतिपादनों पर इतना कट्टर विश्वास करते हैं कि उनमें से किसी को झुठलाना उनके अनुयायियों को मर्मान्तक पीड़ा पहुंचाने के बराबर है। सभी मतवादी अपने मान्यताओं का अपने-अपने ढंग से ऐसा प्रतिपादन करते हैं कि मानो उनका विश्वास ही एकमात्र सत्य है। इसका अर्थ हुआ कि अन्य मतावलम्बी झूठे हैं, जिस एक को सत्य माना जाय वह भी अन्यों की दृष्टि में झूठा है। फिर परस्पर घोर विपरीतता लिए हुए प्रतिपादनों में से किसी को भी सत्य ठहराते नहीं बनता। वह कहानी उपहासास्पद है जिसमें अन्धों ने हाथी के कई अंगों को पकड़कर उसका वर्णन अपने अनुभवों के आधार पर किया था।

🔴  इस कहानी में यह बात नहीं है कि एक ही कान को पकड़कर हर अन्धे ने उसे अलग-अलग प्रकार का बताया था, यहां तो यही होता देखा जा सकता है। पशुबलि को ही लें, एक सम्प्रदाय को तो उसके बिना धर्म-कर्म सम्पन्न ही नहीं होता दूसरा जीव हिंसा को धर्म के घोर विपरीत मानता है। दोनों ही अपनी-अपनी मान्यताओं पर कट्टर हैं, एक वर्ग ईश्वर को साकार बताता है, दूसरा निराकार। अपने-अपने पक्ष की कट्टरता के कारण अब तक असंख्यों बार रक्त की नदियां बहती रही हैं और विपक्षी को धर्मद्रोही बताकर सिर काटने में ईश्वर की प्रसन्नता जानी जाती रही है।

🔵  समाधान जब कभी निकलेगा तब विवेक की कसौटी का सहारा लेने पर ही निकलेगा, अन्य सभी क्षेत्रों की तरह धर्मक्षेत्र में भी असली-नकली का समन्वय बेतरह भरा है। किस धर्म की मान्यताओं में कितना अंश बुद्धि संगत है? यह देखते हुए यदि खिले हुए फूल चुन लिए जांय तो एक सुन्दर गुलदस्ता बन सकता है। बिना दुराग्रह के यदि सार संग्रह की दृष्टि लेकर चला जाये और प्राचीन-नवीन का भेद न किया जाये तो आज की स्थिति में जो उपयुक्त है उसे सर्वसाधारण के लिए प्रस्तुत किया जा सकेगा। वही सामयिक एवं सर्वोपयोगी धर्म हो सकेगा, ऐसे सार-संग्रह में विवेक को—तर्क-तथ्य को ही प्रामाणिक मानकर चलना पड़ेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

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