शनिवार, 26 नवंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 16) 27 Nov

🌹 *विवेक ही हमारा सच्चा मार्गदर्शक*

🔵  वस्तुस्थिति का सही मूल्यांकन कर सकना, कर्म के प्रतिफल का गम्भीरतापूर्वक निष्कर्ष निकलना, उचित-अनुचित के सम्मिश्रण में से जो श्रेयस्कर है उसी को अपनाना—यह विवेक बुद्धि का काम है। मोटी अकल इन प्रसंगों में बेतरह असफल होती है। अवांछनीयता में रहने वाला आकर्षण सामान्य चिन्तन को ऐसे व्यामोह में डाल देता है कि उसे तात्कालिक लाभ को छोड़ने का साहस ही नहीं होता, भले ही पीछे उसका प्रतिफल कुछ भी क्यों न भुगतना पड़े।

🔴  इसी व्यामोह में ग्रस्त होकर अधिकतर लोग आलस्य-प्रमाद से लेकर व्यसन-व्यभिचार तक और क्रूर कुकर्मों की परिधि तक बढ़ते चले जाते हैं। इन्द्रिय लिप्सा में ग्रस्त होकर लोग अपना स्वास्थ्य चौपट करते हैं। वासना-तृष्णा के गुलाम किस प्रकार बहुमूल्य जीवन का निरर्थक गतिविधियों में जीवन सम्पदा गंवाते हैं—यह प्रत्यक्ष है। आंतरिक दोष-दुर्गुणों, षडरिपुओं को अपनाये रहकर व्यक्ति किस प्रकार खोखला होता चला जाता है, इसका प्रमाण आत्म-समीक्षा करके हम स्वयं ही पा सकते हैं।

🔵  अनर्थ मूलक भ्रम-जंजाल से निकालकर श्रेयस्कर दिशा देने की क्षमता केवल विवेक में ही होती है। वह जिसके पास मौजूद है समझना चाहिए कि उसी के लिए औचित्य अपनाना सम्भव होगा और वही कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर सकने में समर्थ होगा। विवेक शीलता की कमी अन्य किसी गुण से पूरी नहीं हो सकती, अन्य गुण कितनी ही बड़ी मात्रा में क्यों न हों, पर यदि विवेक का अभाव है तो वह सही दिशा का चुनाव न कर सकेगा। दिग्भ्रान्त मनुष्य कितना ही श्रम क्यों न करे अभीष्ट लक्ष्य तक पहुंच सकना उसके लिए सम्भव ही न होगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

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