मंगलवार, 30 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 28) (In The Hours Of Meditation)


और मेरी आत्मा में ये शब्द आये:-

🔴 मैं सर्वदा तुम्हारे पास हूँ। जब तुम्हारे पापों के जाल कसने लगें तथा गहन अंधकार में कष्ट पा रहे होओ तब यह जान रखो कि वहाँ मैं भी तुम्हारे साथ तुम्हारे महापराधों के कष्टों को भोगने में सहभागी हूँ। तुम्हारी अन्तरात्मा के कार्यों को भली भाँति जानने के कारण मैं तुम्हारी अन्तरात्मा के संबंध में सजग हूँ। मैं, जो सर्वव्यापी हूँ उससे तुम कुछ भी नहीं छिपा सकते, अपने गोपन विचारों का अत्यल्प अंश भी नहीं। मैं तुम में हूँ। मैं तुम्हें भली भाँति जानता हूँ। मेरे बिना न तो तुम हिल ही सकते हो, न ही साँस ले सकते हो। स्मरण रखो मैं तुम्हारी आत्मा हूँ। तुम जहाँ जाते हो वहाँ मैं जाता हूँ तुम जहाँ रुकते हो वहाँ मैं रुकता हूँ। आओ मेरे हृदय से अपना हृदय मिला लो, उसे अपना बना लो, तब सब ठीक हो जायेगा। हारी हृदय- गुहा की छाया और शांति में मेरा निवास है।

🔵 अब जाओ संसार में निकल पड़ो और मेरी वाणी का इतना व्यापक प्रचार करो जितना व्यापक कि आत्मा है, क्योंकि वही उसका जीवन है। मेरा सर्वसमन्वित प्रेम तथा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है। तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम माँ के प्रेम के समान है। जैसा एक कबूतरी का प्रेम अपने नवजात बच्वों के लिए होता है, वैसा ही प्रेम मेरा तुम्हारे प्रति है। जब कष्ट आते हैं या विपत्तियाँ तुम्हें भयभीत करती हैं तब स्मरण रखना कि मैं तुम्हारा सहायक हूँ। तुम्हारी आत्मा का प्रेमी हूँ।  

🔴 जब ये शब्द समाप्त हुए तब मैंने समझ लिया कि यह गुरुदेव की वाणी थी जिसने मेरे सभी पापों को धो दिया था और तब मैं कह उठा- मेरे प्रभु के सान्निध्य में, उनसे ऐक्यबोध में ध्यानानन्द की कितनी तीव्रता होती है यह मेरा हृदय जानता हैं। अहो! उन दिव्य ईश्वरीय विचारों का प्रवाह कितना मधुर है! और ऋषियों के साथ मैं भी स्वयं से कह उठा! सच्चिदानन्द - सागर में कूदपड़ो! ओ मूर्ख, ईश्वर- सागर में कूद पडो!

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

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