मंगलवार, 30 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 27) (In The Hours Of Meditation)


ध्यान के क्षणों में पुन: यह कहते हुए गुरुदेव उपस्थित हुए-

🔴 सभी शब्दों के पार मौन में, शाश्वत शांति में तुम्हारी आत्मा का निवास है। इन्द्रियों के तुमुल कोलाहल से दूर, जीवन की यातना और दु:खों से दूर, पाप और संताप की भावना से दूर तथापि उन सभी के मध्य दिव्यता का निवास है जो कि अस्तिमात्र है। संसारस्वप्न के ताने बाने कितने आश्चर्यजनक है! किन्तु स्वप्नद्रष्टा उससे भी अधिक आश्चर्यजनक है। हे आत्मन! तुम अमर, मृत्यु की सीमा के पार, जघन्य कलुषों के मध्य भी निष्कलंक हो। तुम्हारी जड़ें दिव्यता में समायी हुई हैं। शुभ और अशुभ- ये विचारों के मापदण्ड हैं। तुम विचारों के परे सर्वोपरि ज्योति:स्वरूप हो। तुम्हारे स्वरूप का प्रताप सभी वस्तुओं के पार पहुँचा हुआ है। तुम अतुलनीय, शब्दातीत हो।

🔵  हे स्वर्गीय दिव्यज्योति! हे देव, ध्यान और अनुभूति के शीर्ष मुकुट! कौन तुम्हें पापी कहेगा! या महात्मा कहेगा। कौन तुम्हारा वर्णन कर सकेगा या तुम्हारे विषय में सोच भी सकेगा। सभी में एक, सभी में समान, तुम वही अमर आत्मा हो। मर्त्यजीवन के शब्दो में कौन तुम्हें व्यक्त कर सकता है ? तुम उन सभी के परे अमर्त्य हो। और यह जान रखो कि तूफानी विचारों के उपद्रवों के बीच भी उन सबको देखने वाला एक मौन द्रष्टा है। उसके प्रकाश को इन्द्रियों का तुच्छ कच्छ- प्रकाश कभी मंद नहीं कर सकता न ही उसकी शांति को जीवन के सभी कलह दबा सकते हैं। वह चन्द्र, सूर्य, तारों से परे कूटस्थ तथा विचारों की सीमा के बाहर है। वही आत्मा है! आत्मा वही है!! इन्द्रियों के युद्ध में विजयी वही है।

🔴 अज्ञान के पहाड़ कितने भी क्यों न दीख पड़ते हों, पाप और संताप की गहराइयों कितनी भी गहरी क्यों न हों, उसमें सभी ऊँचाई और गहराइयाँ समा जाती हैं। उन सभी विविधताओं को जानो और मुक्त हो जाओ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न...