मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १

भूमिका 

प्रसन्नता, आनंद और संतोष की प्राप्ति के लिए लोग संसार को छान डालते हैं, इधर-उधर मारे-मारे फिरते हैं, वस्तुओं के संग्रह की धूम मचा देते हैं तथा अनेक प्रकार की चेष्टाएँ करते हैं, इतने पर भी अभीष्ट वस्तु प्राप्त नहीं होती। सारे कष्ट साध्य प्रयास निरर्थक चले जाते हैं, मनुष्य प्यासे का प्यासा रह जाता है।

कारण यह है कि उल्लास का उद्गम अपनी आत्मा है, संसार की किसी वस्तु में वह उपलब्ध नहीं हो सकता। जब तक यह तथ्य समझ में नहीं आता, तब तक बालू से तेल निकालने की तरह आनंद प्राप्ति के प्रयास निष्फल ही रहते हैं। जब हम यह समझ लेते हैं कि आनंद का स्रोत अपने अंदर है और उसे अपने अंदर से ही ढूँढ निकालना होगा, तब सीधा रास्ता मिल जाता है।

आंतरिक सद्वृत्तियों को विकसित करके आंतरिक उल्लास को किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है? बिना' भौतिक वस्तुओं का संचय किए किस प्रकार हम हर घड़ी आनन्द में सरावोर रह सकते हैं? यह तथ्य इस पुस्तक में बताया गया है। आशा है कि पाठक इससे लाभ उठावेंगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ २

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 जीवन लक्ष्य और उसकी प्राप्ति भाग ३

👉 *जीवन का लक्ष्य भी निर्धारित करें * 🔹 जीवन-यापन और जीवन-लक्ष्य दो भिन्न बातें हैं। प्रायः सामान्य लोगों का लक्ष्य जीवन यापन ही रहता है। ...