गुरुवार, 20 जनवरी 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १०३)

भक्त स्वयं तरता है और औरों को भी तारता है

गायत्री महाविद्या के महाविज्ञान के अन्वेषक ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने महर्षि कहोड़ से कहा- ‘‘हे ऋषिप्रवर! भक्ति और भक्त किसी भी विज्ञान एवं वैज्ञानिक से श्रेष्ठ हैं क्योंकि विज्ञान एवं वैज्ञानिक तो बस जीवन एवं जगत की छुट-पुट समस्याओं का समाधान करते हैं परन्तु भक्ति एवं भक्त तो जीवन एवं जगत के तारनहार हैं। वह न केवल स्वयं को बल्कि सम्पूर्ण प्राणियों को भवसागर से पार लगाते हैं।’’ महर्षि विश्वामित्र के इस कथन ने देवर्षि नारद को उत्साहित किया। वह प्रसन्न हो उठे। उन्होंने कहा- ‘‘हे ब्रह्मर्षि! आप सत्य कहते हैं। भक्ति एवं भक्त दोनों ही दुर्लभ हैं। यह जहाँ और जिसको सुलभ हो, वह स्थान एवं वह व्यक्ति धन्य हो जाता है। आज हम सब भी धन्य एवं कृतार्थ हैं- क्योंकि महर्षि कहोड़ आज यहाँ हैं, जिनका प्रकाश हम सभी के अन्तःकरण को प्रकाशित कर रहा है।’’

इतना कहकर देवर्षि कुछ पलों के लिए मौन रहे, फिर बोले- ‘‘यदि आप सब अनुमति दें, तो मैं अपने अगले भक्तिसूत्र का उच्चार करूँ।’’ देवर्षि नारद के इस कथन ने ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के साथ महर्षि कहोड़ को भी उत्साहित किया। उत्साहपूरित होकर महर्षि कहोड़ ने कहा- ‘‘हे देवर्षि नारद! मैं तो आपके सूत्रों का ही श्रवण करने यहाँ आया हूँ। आप जैसे परम भगवद्भक्त से भक्ति की बात सुनकर मैं स्वयं को कृतार्थ अनुभव करूँगा।’’ ऋषि कहोड़ के इतना कहने पर ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने कहा- ‘‘आप अपना सूत्र कहें देवर्षि, क्योंकि मेरा विश्वास है कि आप अपने सूत्र के सत्य एवं तत्त्व को वेदमाता गायत्री के परम भक्त महर्षि कहोड़ के व्यक्तित्व में साकार एवं चरितार्थ होता अनुभव करेंगे।’’
‘‘आपके विश्वास में मेरा विश्वास भी सम्मिलित है ब्रह्मर्षि।’’ इतना कहने के साथ देवर्षि नारद ने कहा-
‘स तरति स तरति स लोकांस्तारयति’॥ ५०॥
वह तरता है, वह तरता है, वह लोगों को तार देता है।

‘‘अद्भुत! विलक्षण!! किन्तु सर्वथा सत्य!!!’’ इसे सुनकर अनेकों के मुख से बरबस निकल पड़ा। हाँ! ऋषि कहोड़ अवश्य मौन बने रहे। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का हर्षातिरेक उनके मुख पर छलक आया। उन्होंने कहा- ‘‘देवर्षि!  ऋषि कहोड़ की भक्ति का और उन पर उड़ेले जा रहे भगवती वेदमाता के अनुराग का मैं स्वयं साक्षी हूँ। यदि आप अनुमति दे तो मैं कुछ कहूँ।’’ ‘‘अवश्य भगवन्! यह आपकी हम सभी पर कृपा होगी’’।

देवर्षि के कथन का समर्थन अन्य ऋषिगणों ने भी किया। सभी की बातें सुनकर ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने कहा- ‘‘तप, योग, ध्यान, ज्ञान आदि जितनी भी आध्यात्मिक साधनाएँ हैं, वे सभी जीवन में सत्त्वगुण को बढ़ाने वाली हैं परन्तु फिर भी इनमें कहीं न कहीं, रजस का प्रभाव बना रहता है। फिर भले ही यह कितना ही कम क्यों न हो परन्तु भक्त एवं भक्ति की श्रेणी अलग है। यह शुद्धतम सत्त्व है, यह न तो तमस की छाया है और न ही रजस का कोई प्रभाव। उल्टे एक परम आश्चर्य यहाँ घटित होता है। वह आश्चर्य यह है कि यदि भक्ति एवं भक्त अपने में यदि सत्य हो तो उनके स्पर्श एवं सान्निध्य मात्र से रजस एवं तमस भी सत्त्व की शुद्धता में रूपान्तरित हो जाते हैं। यही कारण है कि भक्त न केवल स्वयं को तारता है बल्कि लोक के सभी प्राणियों को तारने का कारण बनता है और ऐसा करने के लिए उसे कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं रहती है। उसका स्पर्श एवं सान्निध्य ही इसके लिए पर्याप्त है। इसी से जीवों के जीवन का स्वतः रूपान्तरण हो जाता है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १९७

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