शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ९६)

कुसंग की तरंग बन जाती है महासमुद्र

महर्षि रुक्मवर्ण की अनुभव कथा सुनने वालों के दिलों को गहराई तक छुआ। सभी कहे गए शब्दों के भावों में गहरे डूबे, रोमांचित हुए। इसे सुनते-सुनते किसी की आँखें छलछलाई तो कोई अपनी आँखें मूँदकर स्वयं में खो गया। महर्षि के अपने अतीत की यह अनुभूति थी ही कुछ ऐसी, जो बरबस सभी को स्वयं में घोलती चली गई। इतना ही नहीं, यह स्वयं भी सबमें घुल गई। उन क्षणों में जिन्होंने भी ऋषि रुक्मवर्ण की यह कथा सुनी, उन्हें यह सोचकर सिहरन हो आई कि कितना विषैला फल है कुसंग का। यह कुसंग चिन्तन के द्वार से प्रवेश कर सम्पूर्ण चेतना को विषाक्त कर देता है। फिर क्या है- इसके प्रभाव वाली विषैली मूर्च्छा में व्यक्ति कुछ भी करने लगता है। जो कर रहा है, उसकी दशा एवं उसके दुष्परिणामों के बारे में सोचने की उसकी स्थिति ही नहीं रहती।

अप्रकट रूप से चिंतन की ये लहरें प्रायः सभी के चित्त में उठती-गिरती रहीं, किन्तु प्रकट रूप से सब ओर मौन पसरा रहा। निस्तब्ध पवर्तशिखर मौन साधे खड़े थे। उन्होंने अपनी ओट में झरनों के संगीत को छिपा लिया था। हिमपक्षिों का कलरव भी इस समय शांत था। पशु, जिन्हें बेजुबान कहा जाता है, वे भी अभी इधर-उधर कहीं गुम हो गए थे। ऋषियों, देवों, सिद्धों का यह समुदाय अभी तक इस प्रश्न-कटंक की चुभन कर रहा था कि कुसंग के विषैले काँटों से इस युग को किस तरह से बचाया जाय? लेकिन देवर्षि नारद के मुख मण्डल की भाव ऊर्मियाँ कुछ और ही कह रही थी। उन्हें जैसे अभी कुछ और कहना था। सम्भवतः वे अभी कुसंग के प्रभाव को थोड़ा और अधिक बताया चाहते थे।

उनके इन भावों पर महर्षि पुलह की दृष्टि गई। अपने इस दृष्टि-निक्षेप से अंतर्यामी महर्षि ने देवर्षि के मन का सच जान लिया और उन्होंने लगभग मुस्कराते हुए कहा- ‘‘अपने नवीन सूत्र को कहें देवर्षि! क्योंकि आपका प्रत्येक नवीन सूत्र इस प्रवाहमान भक्ति-सरिता में पवित्र भावों की नई जलधार की भाँति होता है।’’ महर्षि पुलह की मुस्कान और उसके इस कथन ने शून्य नीरवता में सर्वथा नवीन चेतना का संचार किया। सभी की चेतना के उद्यान में अनायास भावों के पुष्प विहँस उठे। इस दश्य ने देवर्षि को भी विभोर किया। उन्होंने प्रसन्नता के साथ अपने नवीन सूत्र का उच्चार करते हुए कहा-

‘‘तरङ्गायिता अपीमे सङ्गात्समुद्रायन्ति’’॥ ४५॥
ये(काम, क्रोध आदि विकार) पहले तरंग की तरह (क्षुद्र आकार में) आकार भी (दुःसंग के प्रभाव से) विशाल समुद्र का आकार ग्रहण कर लेते हैं।

देवों के भी पूज्य ऋषि नारद के मुख से यह सूत्र सुनकर ऋषि पुलह के माथे की लकीरें कुछ गहरी हुईं। उनके मुख की प्रदीप्ति में एक घनापन आया, परन्तु वे मौन रहे। उनके इस सूक्ष्म भाव-परिवर्तन को देवर्षि सहित सभी ने निहारा। देवर्षि कुछ क्षणों तक उन्हें यों ही देखते रहे, फिर  बोले- ‘‘मेरे आज के सूत्र पर आप कुछ कहेंगे ऋषिश्रेष्ठ।’’ उत्तम में महर्षि पुलह ने धीमे स्वर में कहा ‘‘इस बारे में कहने के लिए कुछ नया नहीं है। जो कुछ मैं कहना चाहता हूँ उसे आप सभी जानते हैं। पुराणकथाओं में भी इसका उल्लेख है। मेरी यदि कुछ नवीनता है तो बस इतनी कि मैं इस घटनाक्रम का स्वयं साक्षी रहा हूँ।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १८२

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