गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ९२)

सर्वथा त्याज्य है दुःसंग


महर्षि रुक्मवर्ण की वाणी अनुभूति का अमृतनिर्झर बन गयी, जिसमें सभी के अस्तित्त्व स्नात हुए, शीतल हुए, शान्त हुए। सब ने अपने भीगे भावों में अनुभव किया कि कोरी कल्पनाएँ, बौद्धिक विचारणाएँ कागज के फूलों की भांति निष्प्राण, सारहीन व सुगन्धहीन होती हैं। उनका होना केवल दिखावटी व बाहरी होता है। इनके अन्तर्प्रभाव न तो कभी सम्भव हैं और न ही हो पाएँगे जबकि अनुभूति में डूबे शब्दों में प्राणों का पराग होता है। इनमें होती है अनोखी सुरभि जो सुनने वालों में सतह से तल तक हिलोर पैदा करती है। ऐसी हिलोर जो कण-कण को, अणु-अणु को, नवीनता का अनुभव देती है। अभी भी यहाँ कुछ ऐसा ही हुआ था। हिमालय की छांव में बैठी हुई ये सभी दैवी विभूतियाँ महर्षि रूक्मवर्ण का सान्निध्य पाकर स्वयं को अहोभाव से सम्पूरित महसूस कर रही थीं। उन्हें यह स्पष्ट लग रहा था कि भक्त के सान्निध्य में भक्ति के नवीन भाव अंकुरित होते हैं। भावों के नए आकाश में श्रद्धा और समर्पण के सूर्य उदय होते हैं।


महर्षि, देवों एवं सिद्धों के मन इन क्षणों में कुछ इन्हीं विचारवीथियों से गुजर रहे थे। पुलकन और प्रसन्नता, अन्तअर्स्तित्त्व में व बाहरी वातावरण में एक साथ अनुभूत हो रही थी पर महर्षि रूक्मवर्ण अभी भी किन्हीं अनजान स्मृतियों में खोए हुए थे। यदा-कदा उनके मुख पर कुछ ऐसा कौंध जाता जैसे कि अभी उनके अन्तर्भावों में कुछ ऐसा है जो अभिव्यक्त होने के लिए आतुर है। यद्यपि उन्होंने कुछ कहा नहीं फिर भी अन्तर्ज्ञानी महर्षि कहोल ने स्वयं में इसे समझ लिया। उन्होंने नीरव मौन की निःस्पन्दता में मुखरता के स्पन्दनों की उजास घोली और वह बोले- ‘‘महर्षि! पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि आपकी कथा की कुछ और कड़ियाँ भी हैं, जिन्हें अभी कहना-सुनना शेष है।’’


ऋषि कहोल के कथन को सुनकर महर्षि रूक्मवर्ण के होठों पर हल्की सी मुस्कान की रेखा झलकी। उन्होंने इस मन्दस्मित के साथ कहा- ‘‘हाँ! यह सत्य है। मैंने अभी केवल आधी बात कही है। अभी तक बस इतना ही कहा है कि भक्तिसाधना के साधक को भक्तों का संग करना चाहिए। उनके सान्निध्य-सुपास में रहना चाहिए। लेकिन यह केवल अधूरा सच है। इसका आधा भाग यह भी है कि उन्हें दुःसंग का सर्वथा त्याग करना चाहिए। दुःसंग के क्षण में शाश्वत खो जाता है। इस बारे में देवर्षि नारद सम्भवतः अपने सूत्र में कुछ कह सकें।’’

ऋषि रूक्मवर्ण की बातों को बड़े ही ध्यान से सुन रहे देवर्षि नारद ने बड़ी विनम्रता से कहा- ‘‘महर्षि मेरे अगले सूत्र में यही सत्य कहा गया है’’-
‘दुःसङ्गः सर्वथैव त्याज्यः’॥ ४३॥

दुःसङ्ग का सर्वथा त्याग करना चाहिए। इतना कहते हुए देवर्षि ने निवेदन किया, इस सूत्र की व्याख्या भी आप ही करें क्योंकि अनुभव की व्यापकता में ही इस सूत्र का सत्य सही ढंग से प्रकाशित हो सकेगा। देवर्षि के इस अनुरोध की सम्भवतः महर्षि को आशा थी। उन्होंने इसे सहजता से स्वीकार कर लिया। अन्य ऋषि-महर्षियों ने भी उनसे यही अनुरोध किया। सभी के इस अनुनय को स्वीकारते हुए वह कहने लगे- ‘‘यद्यपि दुःसंग सर्वथा-सर्वकाल में त्याज्य है परन्तु बचपन एवं यौवन में इसके परिणाम सर्वनाशी होते हैं। ऐसा नहीं है कि वृद्धावस्था इससे अछूती है, फिर भी वृद्धों से विवेक की उम्मीद रहती है। हालांकि अब कलि के प्रभाव से वृद्धावस्था भी विवेकहीन होती जा रही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १७५

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