मंगलवार, 7 सितंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ६०)

कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठ है भक्ति

नारद के इस कथन पर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ कहने लगे- ‘‘जब मैं महर्षि मतंग के आश्रम में पहुँचा था, तब वह शबरकन्या मुझे प्रणाम करने आयी थी। वह कितनी भोली, सरल, निश्छल व निर्दोष थी यह उससे मिलकर ही जाना जा सकता था। भक्ति का साकार विग्रह थी वह। महर्षि मतंग ने मुझे उसके बारे में बताया- यह एक वनवासी शबर की कन्या है। इसके पिता अपने कबीले के सरदार हैं। यह कन्या बचपन से ही सरल सात्त्विक थी। वनवासियों की प्रथा के मुताबिक इसकी शादी शीघ्र ही तय होगी। प्रथा के मुताबिक उसके विवाह में अनेकों पशुओं की बलि दी जानी थी। अनेकों पशुओं को मारकर उनके मांस के भोज्य पदार्थ बनने थे।
    
मेरे कारण इतने निर्दोष पशु मारे जाएँगे, यह सोचकर यह शबर कन्या घर से भाग आयी और मेरे आश्रम के पास आकर रहने लगी। यहाँ रहते हुए यह नित्य प्रति आश्रम से सरोवर तक का मार्ग साफ करती। चुपचाप आश्रम में आकर समिधा के लिए लकड़ी रख जाती। एक दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में सरोवर जाते समय मैंने इसे मार्ग बुहारते हुए देखा। मेरे पुकारने पर वह भय से सहमकर मेरे पास खड़ी हो गयी और बहुत आग्रह करने पर उसने मुझे अपनी आपबीती सुनायी। उसकी बातें सुनकर मैं इसे अपने साथ आश्रम ले आया। अब वह मेरी पुत्री भी है और शिष्या भी।’’
    
इतना कहकर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ रुक गए। काफी देर चुप रहकर वह शून्य की ओर ताकते रहे फिर बोले- ‘‘आगे की कथा मुझे वत्स लक्ष्मण ने सुनायी थी। इस बीच कई घटनाएँ घट चुकी थीं और महर्षि मतंग ने शरीर छोड़ दिया था। शरीर छोड़ते समय उन्होंने शबरी से कहा था कि तुम्हें यहीं रहकर भगवान् को पुकारना है, वे स्वयं चलकर तुम्हारे पास आएँगे। महर्षि मतंग के जाने के बाद, वहाँ पास रहने वाले लोगों ने उसे बहुत सताया। इनमें से कई ऐसे भी थे, जो स्वयं को ज्ञानी, योगी और कर्मकुशल कहते थे परन्तु शबरी अविचल भाव से अपने राम को पुकारती रही। वह नियमित उनके लिए मार्ग बुहारती, उनके लिए मीठे फल लाती। उसकी पुकार गहरी होती गयी।
    
और एक दिन वत्स रामभद्र के रूप में भगवान् साकार रूप धर कर अपनी इस प्रिय भक्त को खोजने चल दिए। शबरी की पुकार, उसके आँसू, उसका रुदन उसकी साधना बन गया। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, मेरे वत्स रामभद्र, वत्स लक्ष्मण के साथ पहुँच गए- अपनी इस प्रिय भक्त के पास। वत्स लक्ष्मण ने मुझे बताया कि भ्राता राम उसके पास जाते समय कितने भावविह्वल थे, इसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता। वह विकल और व्याकुल थे- भक्त शबरी को मिलने के लिए। उन्होंने शबरी के आश्रम जाकर उसके झूठे बेर खाये। अपने को ज्ञानी, योगी एवं कर्म-परायण कहने वालों की ओर उन्होंने देखा भी नहीं। जबकि शबरी उन्हीं के सामने समाधि लीन हुई। उसका अन्तिम संस्कार भी स्वयं उन्होंने किया। अपने मुख से श्रीराम ने अनेकों बार उसकी महिमा गायी। और यह प्रमाणित कर दिया कि भक्ति ज्ञान से, कर्मयोग से और योगसिद्धि से श्रेष्ठतर है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०७

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