सोमवार, 6 सितंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ५९)

कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठ है भक्ति

देवर्षि के इन स्वरों में वीणा की झंकृति थी। यह झंकृति कुछ ऐसी थी कि उपस्थित सभी लोगों की हृदय वीणा अपने आप ही झंकृत हो उठी। सभी के भाव अपने आप ही समस्वरित हो गए। जो वहाँ थे सबके सब विभूति सम्पन्न थे। महान् कर्मयोगी, महाज्ञानी, योगसिद्ध महामानव उस समागम में उपस्थित थे। ब्रह्मा जी के मानसपुत्र नारद की बातों ने सबको चौंकाया, चकित किया, पर सब चुप रहे। हाँ, देवर्षि अवश्य अपनी रौ में कहे जा रहे थे- ‘‘भक्ति की श्रेष्ठता यही है कि यह भगवान् के द्वारा भक्त की खोज है। सुरसरि सागर की तरफ जाय तो कर्म, योग और ज्ञान, पर जब सागर सुरसरि की ओर दौड़ा चला आए तो भक्ति। भक्ति कुछ ऐसी है कि छोटा बच्चा पुकारता, रोता है, तो माँ दौड़ी चली आती है। भक्ति तो बस भक्त का रुदन है। भक्त के हृदय से उठी आह है।
    
भक्ति जीवन की सारी साधना, सारे प्रयास-प्रयत्नों की व्यर्थता को स्वीकार है। भक्ति तो बस भक्त के आँसू है, जो अपने भगवान् को पुकारते हुए बहाता है। कर्मयोग कहता है- तुम गलत कर रहे हो, ठीक करने लगो तो पहुँच जाओगे। ज्ञान योग कहता है कि तुम गलत जानते हो, सही जान लो तो पहुँच जाओगे। योगशास्त्र कहता है तुम्हें विधियों का ज्ञान नहीं है, राहें मालूम नहीं है, विधियाँ सीख लो, उनका अभ्यास करो तो पहुँच जाओगे। भक्ति कहती है- तुम ही गलत हो- न ज्ञान से पहुँचोगे, न कर्म से और न योग से। बस तुम अपने अहं से छूटकर अपने भगवान के हो जाओ। अब न रहे तुम्हारा परिचय, बस केवल तुम्हारे प्रभु ही तुम्हारा परिचय बन जायें तो पहुँच जाओगे। भला छोटा सा बच्चा कैसे ढूँढे अपनी माँ को, वह तो रोएगा, माँ अपने आप ही उसे ढूँढ लेगी। भक्त बस रो-रो कर पुकारेगा अपने भगवान को, वे स्वयं ही उसे ढूँढ लेंगे। यही तो भक्ति है।’’
    
देवर्षि नारद की बातों में भावों का अपूर्व आवेग था। इस आवेग ने सबको अपने में समेट लिया। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की भी आँखें भीग गयीं। थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह बोले- ‘‘शबरी ऐसी ही भक्त थी। मैंने एक बार उस भोली बालिका को तब देखा था, जब वह महर्षि मतंग के आश्रम में आयी थी। बाद में बहुत समय के बाद युगावतार मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपने प्रिय भ्राता लक्ष्मण के साथ उससे मिलने गए थे। इस मिलन की कथा वत्स लक्ष्मण ने मुझे अयोध्या वापस आने पर सुनायी थी।’’ ब्रह्मर्षि की ये बातें सुनकर समूची सभा ने समवेत स्वर में कहा- ‘‘उन महान भक्त की कथा सुनाकर हमें भी अनुग्रहीत करें देवर्षि!’’ इस निवेदन के उत्तर में वशिष्ठ ने नारद की ओर देखा। उन्हें अपनी ओर देखकर नारद ने गद्गद् कण्ठ से कहा- ‘‘आपके मुख से शबरी की कथा सुनकर हम सभी धन्य होंगे।’’
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०६

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 जीवन लक्ष्य और उसकी प्राप्ति भाग ३

👉 *जीवन का लक्ष्य भी निर्धारित करें * 🔹 जीवन-यापन और जीवन-लक्ष्य दो भिन्न बातें हैं। प्रायः सामान्य लोगों का लक्ष्य जीवन यापन ही रहता है। ...