रविवार, 5 सितंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ५८)

कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठ है भक्ति
    
भक्तिसरिता की लहरों में भाव भीगते रहे। सप्तर्षियों के साथ अन्य ऋषियों, देवों, सिद्धों व गन्धर्वों का समुदाय भक्ति के सरस भावों में अपने को निमज्जित करता रहा। किसी को भी समय का चेत न रहा। बस उनकी चेतना के चैतन्य में भक्ति के अनेकों बिम्ब बनते और घुलते रहे। बड़ी अपूर्व स्थिति थी। ऐसा लग रहा था, जैसे कि सभी काल की सीमा से दूर चले गए हों अथवा यदि काल का स्पर्श हो भी रहा हो तो यहाँ यह काल अतीत-वर्तमान व भविष्य में खण्डित न था। यहाँ तो काल अखण्ड-अविराम हो अविरल अपनी स्वयं की सत्ता में, स्वयं ही भूला हुआ था। यह अनुभूति अद्भुत थी। महाकाल की महिमा भक्ति के इस महाभाव में झलक रही थी- छलक रही थी।
    
देर तक यह स्थिति बनी रही। धीरे-धीरे अखण्ड महाकाल के महाप्रवाह से अतीत, वर्तमान व भविष्य के काल खण्ड प्रकट होना प्रारम्भ हुए। इसके वर्तमान कालखण्ड से दिवस, रात्रि, घटी, क्षण व पल का बोध चेतना के चैतन्य में प्रकट हुआ। यह कालबोध सबसे पहले ब्रह्मर्षि वसिष्ठ की चेतना में उभरा। उन्हें चेत होने पर उनको बाह्य जगत् की स्थिति का बोध हुआ। उन्होंने देखा कि भक्ति समागम में उपस्थित सबके सब भक्ति की गहनता में खोए हुए हैं। उन्होंने निराकार ब्रह्म से एकाकार होकर ब्रह्मसंकल्प किया और फिर प्रभु के सगुण-साकार रूप का ध्यान धर सभी की चेतना के चैतन्य को बहिर्मुख किया। सचमुच ही यह बड़ी गहरी समाधि थी। अगर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ यह महत्कार्य न सम्पन्न करते तो पता नहीं कब तक सब की यह भावदशा बनी रहती।
    
परन्तु अब स्थिति भिन्न थी। अब भी सब के सब भाव विह्वल तो थे परन्तु उन्हें बाह्य जगत् का बोध था। देवर्षि को अभी भी अपनी सुधि नहीं थी। हाँ! उनके मुख से प्रभु नाम के अस्फुट स्वर अवश्य निकल रहे थे। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उनकी ओर बड़ी भावपूर्ण दृष्टि से देखा और मीठे स्वर में बोले- ‘‘हे देवर्षि! अब आप ही हम सबको भक्ति के नवीन आयाम की ओर ले चलें, अपने नवीन सूत्र का सत्य उच्चारें।’’ ब्रह्मर्षि के इस कथन पर देवर्षि नारद ने सभी को निहारा। सभी के मुख पर जिज्ञासा की चमक थी। सब को प्रतीक्षा थी कि ब्रह्मपुत्र नारद कुछ नया कहेंगे। स्थिति को देखकर नारद ने भी बिना पल की देर लगाए कहा-
‘सा तु कर्मज्ञान योगेभ्योऽप्यधिकतरा’॥ २५॥
वह (भक्ति) कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठतर है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०५

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