बुधवार, 15 सितंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ६३)

अभिमानी से दूर हैं ईश्वर

देवर्षि के मुख से उच्चारित सूत्र को सुनकर ऋषिगण पुलकित हुए और देवगण हर्षित। सभी ने इस सच को जान लिया था कि यदि भावों में भक्ति समा जाय तो अध्यात्म के सभी तत्त्व स्वतः प्रकाशित हो जाते हैं। अन्तःकरण अनोखी उजास से भर जाता है। भगवान और भक्त के मिलन का प्रधान अवरोध अहं तो भक्ति की आहट पाते ही गिर जाता है। और यदि भक्ति न रहे तो साधन कोई भी, और कितने भी क्यों न किए जाएँ परन्तु विषय भोगों की लालसा-लपटें उठाने वाली हवाएँ, विवेक के दीप को कभी न कभी बुझा ही देती हैं। यदि चित्त चेतना में ऐसा हो गया तो फिर बचा रह जाता है बस अहं का उन्मादी खेल। साधना का सच और साधकों का सच युगों से यही रहा है। युग-युग में अध्यात्म पथ के पथिक यही अनुभव करते रहे हैं।
    
भगवान् के लीला पार्षद नारद के अन्तःसरोवर में उठ रही चिन्तन की इन उर्मियों ने उन्हें गहरे अतीत में धकेल दिया। वह बस भावमग्न हो सोचते रहे। हालांकि वहाँ उपस्थित सभी को उनके अगले सूत्र की प्रतीक्षा थी। पर उनके भावों का आवेग थम ही नहीं रहा था। वह अपनी अनुभूतियों में डूबे हुए थे। ये अनुभूतियाँ उन्हें आत्मसमीक्षा के लिए प्रेरित कर रही थीं। उनका अपना अतीत उनसे कुछ कह रहा था। यह वह गहरा अनुभव था जिसने उन्हें भक्ति का एक सत्य दिया था। जिसे वह अब तक अपने सूत्र में पिरो चुके थे। यह देवर्षि की अपनी आपबीती थी। हालांकि उन्होंने अपने अन्तर्भाव किसी से नहीं कहे परन्तु यह पार्थिव चेतना की भूमि नहीं थी, यह तो प्रज्ञा-लोक था। इस लोक में, प्रज्ञा के आलोक में सभी कुछ प्रकाशित था।
    
इस आलोक की प्रखर दीप्ति में रमे ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने मधुर स्वर में कहा- ‘‘देवर्षि हम सभी आपके भक्ति सत्य की प्रतीक्षा कर रहे हैं।’’ उत्तर में नारद ने अहं विगलित मौन के साथ उन्हें निहारा और फिर मन्द स्वर में बोले-
‘ईश्वरस्याप्यभिमानद्वेषित्वाद् दैन्यप्रियत्वाच्च’॥२७॥
ईश्वर को भी अभिमान से द्वेष है और दैन्य से प्रिय भाव है।’’
    
इस सूत्र का उच्चारण करते हुए नारद ने सभी महनीय जनों की ओर देखा, उनके मुख पर कुछ और अधिक सुनने की लालसा थी। वे जानना चाहते थे इस सूत्र में पिरोया रहस्यपूर्ण सत्य।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ११३

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