सोमवार, 9 अगस्त 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ४७)

भक्तों के वश में रहते हैं भगवान

ऋषि अघोर के शब्दों की छुअन ने सभी के भावों को भिगो दिया। हर एक को यह अनुभव हो रहा था कि स्मरण हृदय से हो, समर्पण सम्पूर्ण हृदय का हो तो भक्ति प्रकट होती है। इन अनुभूति के पलों को सभी आत्मसात कर रहे थे तभी हिमालय के शुभ्र श्वेत शिखरों पर हिम पक्षियों की कलरव ध्वनि सुनायी पड़ी। इस मधुर गीत माला के साथ हिमशिखरों से बहते जलप्रपात ने अपना संगीत पिरोया। नीरव शान्त प्रकृति ने भी इस वातावरण को सुरम्य बनाने के लिए अपना अपूर्व योगदान दिया। चहुँ ओर हर्ष उल्लास, उत्साह की लहर दौड़ गयी। भक्ति की पावन सलिला तो वैसे भी सबके अन्तस में बह रही थी। इसकी पवित्रता की अनुभूति ने वहाँ भावसमाधि जैसा कुछ कर दिया था। यह स्थिति पता नहीं कब तक रहती लेकिन इसी बीच महर्षि देवल ने धीर स्वरों में कहा-‘‘अब देवर्षि अगले सूत्र का उच्चार करें।’’
    
देवर्षि जो अब तक नारायण के पादपद्मों के ध्यान में लीन थे, उनके होठों पर हल्का सा स्मित उभरा। एक पल के लिए उनके नेत्र शून्य अन्तरिक्ष में जा टिके, जैसे कि वह कुछ खोजने की चेष्टा कर रहे हैं। यह सब कुछ ऐसा भी था, जैसे कि वह बिखरी कड़ियों को जोड़ने की चेष्टा कर रहे हों। फिर मधुर स्वरों में उन्होंने उच्चारित किया-  
‘यथा ब्रजगोपिकानाम्’॥१२॥
जैसे ब्रज गोपिकाओं की भक्ति।
    
ऐसा कहते हुए देवर्षि नारद फिर से भाव समाधि में डूब गए। ब्रज का पावन स्मरण गोपियों का सौम्य, सुन्दर और पावन व्यक्तित्व- फिर बाबा नन्द एवं माता यशोदा और भी बहुत कुछ, देवर्षि के स्मृति सरोवर में अनेकों उर्मियाँ उठती-गिरती रहीं।
    
‘‘देवर्षि अपने स्मृति रस का पान हमें भी कराइए’’- ब्रह्मर्षि क्रतु के स्वरों में अनुरोध और जिज्ञासा दोनों ही थे। उन्हें मालूम था कि देवर्षि नारद तो भगवान् नारायण के अनन्य अनुरागी हैं। जब भी परात्पर प्रभु धरा पर अवतरित होते हैं, नारद अवश्य ही अपने आराध्य की लीलाओं का रस पान करने के लिए उन्हीं के आस-पास रहते हैं, इसलिए भक्ति के इन परमाचार्य के पास प्रभु लीलाओं के स्मरण व स्मृति का जो दुर्लभ कोष है, वह अन्यत्र कहीं नहीं है। जो वह सहज में दे सकते हैं, लुटा सकते हैं, वह और कोई कभी भी, कहीं नहीं दे सकता। भगवान नारायण की इन अवतार लीलाओं में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाकथा तो सब तरह से अद्भुत है। इसमें भक्ति के सभी रस जैसे सम्पूर्णतया स्वयं ही समाविष्ट हो गए हैं।
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ८९

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