मंगलवार, 31 अगस्त 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ५५)

भक्ति वही, जिसमें सारी चाहतें मिट जाएँ

ऋषि आपस्तम्ब विचारमग्न थे और देवर्षि भावमग्न। हिमालय इन दोनों के साथ अपने आंगन में उपस्थित ऋषियों, देवों, सिद्धों व गन्धर्वों के समुदाय को अविचल भाव से निहार रहा था। हालांकि उसका अन्तस् भी भक्ति की भावसरिता से सिक्त हो रहा था। भक्ति है भी तो वह जो भावों को विभोर करे, परिष्कृत करे, ऊर्ध्वमुखी बनाए और अन्त में सदा के लिए भक्त को भगवत् चेतना के साथ एकाकार कर दे। हिमालय के सान्निध्य में हो रहे इस अनूठे भक्ति समागम में यही हो रहा था। देवर्षि नारद ने जो ब्रज की कथा सुनायी थी, उसे श्रवण कर ऋषि आपस्तम्ब की शंकाए धुल गयी थीं। उनकी चेतना भी भक्ति के संस्पर्श से पुलकित थी। अन्य ऋषिगण तो ब्रज की यादों से विह्वल थे। गायत्री महाशक्ति के चैतन्य ऊर्जा के प्रवाह को धरा पर अवतीर्ण करने वाले ब्रह्मर्षि विश्वामित्र को तो जैसे समाधि हो आयी थी। उन्हें चेत तो तब हुआ जब ब्रह्मर्षियों में श्रेष्ठ वशिष्ठ ने उन्हें टोकते हुए कहा- ‘‘ब्रह्मर्षि किस अनुभव में खो गए आप? यदि हम सब सत्पात्र हों तो हमें भी अपने अनुभव का अमृतपान कराएँ।’’ उत्तर में ऋषि विश्वामित्र के नेत्र उन्मीलित हुए और उन्होंने बड़ी श्रद्धा के साथ प्रातः के उदीयमान सूर्य को प्रणाम किया जिसकी स्वर्णिम किरणों ने हिमालय के श्वेत शिखरों को स्वर्णिम बना दिया था।
    
सविता के भर्ग को अपने हृदय में सदा धारण करने वाले ब्रह्मर्षि विश्वामित्र कहने लगे- ‘‘हे ब्रह्मर्षि! आज से युगों पूर्व त्रेतायुग में जब परात्पर ब्रह्म ने श्रीराम रूप धारण किया था, उस समय मैं, उनके और अनुज लक्ष्मण के साथ मिथिला गया था। वहाँ रंगभूमि में मैंने विदेह कन्या सीता को देखा। मुझे आज भी याद है कि वह किस तरह सुकुमार कलिका की भांति संकुचित व सहमी हुई थी पर यह उनका बाह्य आवरण था।
    
उनके अन्तस् में कोटि-कोटि ब्रह्माण्डों का सृजन-पालन एवं लय करने वाली महाऊर्जा का विराट् अनन्त चैतन्य सागर हिलोरें ले रहा था। उन्हें देखते ही मैं पहचान गया कि वेदमाता गायत्री ही सीता का रूप धरे जनक की रंगभूमि में विचरण कर रही हैं। मैंने उन महामाया को भाव भरे मन से प्रणाम करते हुए प्रार्थना की- हे उद्भवस्थिति-संहारकारिणी माँ! अपने इस शिशु पर करूणा करो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०१

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