मंगलवार, 24 अगस्त 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ५३)

गोपियों के कृष्ण प्रेम का मर्म

उत्सुकता के तीव्र किन्तु मौन स्पन्दन मुखर हो नीरवता को बेधते रहे। अन्तस में एक कशमकश थी। ऐसे कई प्रश्न कंटक थे, जो कई मनों में एक साथ चुभ रहे थे। कहीं नैतिकता एवं आध्यात्मिक भावना में एक द्वन्द भी था। श्रीकृष्ण का गोपीप्रेम अथवा गोपियों की कृष्णभक्ति सामाजिक एवं नैतिक मानदण्डों पर कतनी सार्थक है? श्रीकृष्ण के पूर्ण ब्रह्मतत्त्व से अनभिज्ञ लोग इससे क्या सीखेगें और क्या पाएगें? ये और ऐसे ही अनेक प्रश्न उन ऋषियों-महर्षियों के थे जिन्होंने अपने युग में स्मृतियाँ लिखी थीं-संहिताएँ रचीं थीं। महर्षि आपस्तम्ब इन्हीं में से एक थे। इन्होंने कहा तो कुछ भी नहीं, लेकिन उनके अन्तर्मन में उमड़ रही बेचैनी मुखमण्डल पर सघनता से छा गयी। माथे  पर एक के बाद एक कई लकीरें बनीं और मिटीं।
    
अन्तर्ज्ञान सर्वज्ञता से सम्पन्न सप्तऋषियों का समूह श्रीकृष्ण तत्त्व से सुपरिचित होने के बावजूद देवर्षि की ओर देख रहा था। उन्हें आशा थी कि देवर्षि अपने नए सूत्र में इन प्रश्नों का अवश्य समाधान करेंगे परन्तु देवर्षि अभी तक मौन थे। उनके इस मौन में समाधान की समाधिमयता थी। पर्याप्त देर तक इसी तरह की नीरवता बनी रही। तब कहीं जाकर देवर्षि ने आंखें खोलीं, उनके आँखें खोलते ही हिमवान के इस दिव्य आंगन में भक्ति की उजास छा गयी। उन्होंने अपने आस-पास के वातावरण के स्पन्दनों को अनुभव किया, फिर कहने लगे- ‘‘श्रीकृष्ण परात्पर ब्रह्म हैं, उनसे प्रेम की सघनता न तो सामाजिकता की विरोधक रही है और न ही इससे नैतिक तटबन्ध टूटते हैं।
    
श्रीकृष्ण के मन में गोपियों के प्रति जो प्रेम जगा था, वह परमात्मा का जीवात्माओं के प्रति सहज प्रेम था। गोपियाँ श्रीकृष्ण के सत्य स्वरूप को जानती थीं, उनकी भक्ति में परमात्मा को जीवात्मा द्वारा किए जाने वाले समर्पण का भाव था। इस भक्ति प्रकरण का एक सच यह भी है कि सामाजिकता और नैतिकता की सीमाएँ केवल स्थूल शरीर तक ही सीमित हैं जबकि गोपियों एवं श्रीकृष्ण की भक्ति-प्रेमकथा, कारण शरीर के व्यापक विस्तार में घटित हुई थी। इस तथ्य में साधना का यह सच भी सम्मिलित है कि यदि कोई अपनी वासनाओं को भी भगवान को अर्पित कर देता है तो वे भी रूपान्तरित होकर भक्तिपूर्ण भावनाओं का स्वरूप पा जाती हैं। आज गोपियाँ उसी साधना सच के रूप में साकार थीं।
    
वासना, तृष्णा, अहंता का भगवद्चेतना में समर्पण, विसर्जन एवं विलय मोक्ष के द्वार खोलता है। जबकि गोपिकाएँ तो जन्म-जन्मान्तर से श्रीकृष्ण की भक्त थीं। उन्हें सम्पूर्णतया मालूम था कि गोपनन्द के नन्दन श्रीकृष्ण परमात्मा का साकार विग्रह हैं।’’ अपने इस वाक्य को पूरा करते हुए देवर्षि हंस पड़े। फिर उन्होंने मधुर ध्वनि में अपने नए सूत्र का उच्चारण किया-
‘तद्विहीनं जाराणभिव’॥२३॥
उसके बिना, श्रीकृष्ण के परमात्मस्वरूप को जाने बिना, किया जाने वाला प्रेम व्यभिचारियों के प्रेम के समान होता।

इस सूत्र को पूर्ण करके देवर्षि ने महर्षि आपस्तम्ब की ओर देखा और कहा- ‘‘नीतिकार, स्मृति एवं संहिताओं के रचयिता महर्षियों के अनुभव में यह सच भी होना चाहिए कि महान् उद्देश्यों से जुड़ कर सामान्य संसारी क्रियाएँ एवं भावनाएँ भी महान हो जाती हैं। जबकि छोटे, बौने एवं ओछे उद्देश्यों के लिए किया गया महानता का प्रदर्शन भी घटिया एवं ओछा ही बना रहता है।’’
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ९७

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