शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ५१)


अद्भुत थी ब्रज गोपिकाओं की भक्ति

मैया ने बलदाऊ से कहा- बलभद्र! तुम बड़े हो, समझदार हो। ये कन्हैया तो नटखट और चपल है। तुम अपने भाई और सखाओं का ध्यान रखना। दाऊ ने सिर हिलाकर हामी भरी और यतिं्कचित मुस्कराए भी, अरे यह मैया भी कितनी भोली है, जो समूची सृष्टि का ध्यान रखता है, भला उसका कौन ध्यान रखेगा पर उन्होंने कहा कुछ नहीं- सबके साथ चल पड़े। रास्ते में मनसुखा ने कहा- कि कान्हा आज हम सब किधर चलेंगे। उत्तर में कन्हैया मुस्कराए और बोले मैं तो कहीं भी आता जाता नहीं। जो मुझे बुलाता है मैं उसी के पास जाता हूँ।
    
लेकिन मनसुखा की समझ में यह सब नहीं आया। वह कहने लगे, कि कान्हा! इन गोपियों के पास आज नहीं चलेंगे। ये सब मैया से हमारी शिकायत लगाती हैं। मनसुखा दादा! तुम जानते हो कि यदि कोई मुझे बुलाए तो मैं रूकता नहीं हूँ। इधर कान्हा-मनसुखा की बातों से अनजान गोपियाँ अपने-अपने घरों में अपने हृदय धन के आने का इन्तजार कर रही थीं। सुमुखि, सुनयना, त्रिशला, विशाखा, श्यामा और भी न जाने कितनी सखियों को इन्तजार था- अपने प्यारे कन्हाई के आने का। पर आज किसी को कृष्ण कहीं नहीं दिख रहे थे।
    
वे तो कहीं किसी अन्य भावलोक में नयी लीला के सूत्र रच रहे थे। उनकी प्रेरणा से भगवान् सदाशिव योगी वेश में ब्रज आए। भगवती पूर्णमासी बनी योगमाया ने विहंस कर उनकी अगवानी की और कहने लगीं- आज यहाँ कैसे पधारे प्रभु! भगवान् भोलेनाथ हंसकर बोले- अरे देवी! मैं तो नटवरनागर की लीला का एक पात्र हूँ। वे प्रभु जैसा चाहते हैं वैसा ही मैं कर लेता हूँ। यह कहकर भगवान् सदाशिव, योगी वेश में ब्रज की गलियों में विचरने लगे। उनके मुख से निकलती- ‘अलख निरंजन’ की ध्वनि ब्रज के घरों, गलियों, चौबारों में गूंजने लगी।
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ९४

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