बुधवार, 7 जुलाई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ३७)

भगवान में अनुराग का नाम है भक्ति
    
‘‘अद्भुत हैं आप और आपके द्वारा सम्पन्न पूजा! यह तो भक्ति का अनूठा आयाम है’’, महर्षि क्रतु जो सभी ब्रह्मर्षियों के पूज्य थे, बोल पड़े।

इस पर देवर्षि कुछ पलों के मौन के बाद मुखर हो बोले-
‘पूजादिष्वनुराग इति पाराशर्यः’॥ १६॥
पाराशर के पुत्र व्यास के अनुसार भगवान की पूजा आदि में अनुराग होना भक्ति है।
    
फिर अपने ही सूत्र की व्याख्या में देवर्षि ने कहा-‘‘प्रभु तो सर्वव्यापी और अनन्त हैं। पर भक्त उन्हें अपनी भावनाओं में बाँधता है-पूजा की प्रक्रिया से। वह परमात्मा को प्रतिस्थापित करता है-मूर्ति में, चित्र में। वह उन प्रभु को आमंत्रित करता है। वह उनसे कहता है कि इसमें आओ और विराजो। क्योंकि तुम तो हो निराकार, कहाँ और कैसे तुम्हारी आरती उतारूँ मैं? हाथ मेरे छोटे हैं, तुम छोटे बनो। तुम तो हो विराट्, कहाँ धूप-दीप सजाऊँ? मैं छोटा और सीमित हूँ, तुम मेरी सीमा के भीतर आ जाओ। तुम्हारा तो कोई ओर-छोर नहीं-कहाँ नाचूँ? किसके सामने गीत गाऊँ? तुम इस मूर्ति में बैठो।’’
    
ऐसा कहते हुए देवर्षि की वाणी भावों से भीग गयी और वह चुप हो गये। ऐसा लग रहा था जैसे कि उन्हें किसी की स्मृतियों ने घेर लिया है। उनकी यह चुप्पी गंधर्व विश्वावसु से सही न गयी। वह विनीत स्वर में बोले-‘‘हम सब पर कृपा करके अपने भावों को प्रकट करें।’’ उत्तर में देवर्षि अपने भावों की गहनता से उबरते हुए बोले-‘‘हमें चण्डाल पुत्र ‘सुगना’ की कथा याद आ रही है। यदि आप सब अनुमति दें तो मैं उस परम भगवद्भक्त की भक्तिगाथा कहूँ।’’ ‘‘अवश्य देवर्षि!’’, परम तेजस्वी अग्निशिखा की भाँति प्रज्वलित अंगिरा कह उठे-‘‘धन्य है वह सुगना जो चण्डाल होते हुए भी अभी तक अपनी भक्ति के कारण आपकी स्मृतियों में बना हुआ है।’’
    
‘‘वह था ही कुछ ऐसा भक्तिपरायण। उसके पिता भारत की धरती पर बहने वाली पवित्र गोदावरी के किनारे एक छोटे से गाँव में रहते थे। उस समय उस प्रदेश में महापराक्रमी राजा इन्द्रादित्य का शासन था। जो महावीर होने के साथ अनन्य भगवद्भक्त भी थे। उन्होंने स्थान-स्थान पर कई देवमंदिर बनवाये थे। उन्हीं के द्वारा बनवाया एक मंदिर सुगना के गाँव में भी था जिसमें गाँव के एक वृद्ध ब्राह्मण पूजा किया करते थे। बालक सुगना भी जब-तब मंदिर के सामने से गुजरता और ब्राह्मण देवता की इस पूजा प्रक्रिया को छिप-छिप करके देख लेता। उसे पुजारी ब्राह्मण के द्वारा बोले गये संस्कृत के मंत्र तो समझ में नहीं आते थे, परन्तु भगवान के श्रीविग्रह पर पुष्प चढ़ाना-नैवेद्य अर्पित करना, उनकी आरती उतारना उसे बहुत ही भाता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ७१

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