शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ४१)

अविनाशी चैतन्य के प्रति समर्पण है भक्ति

परम भागवत शुकदेव की वाणी का रस देवर्षि की वीणा की झंकृति में घुलकर सभी के अंतस् में गहरे उतर गया। स्थिति कुछ ऐसी बनी कि भगवद्भक्तों की कौन कहे, परमज्ञानी एवं महाविरागी भी भावमय हो उठे। तत्त्वविचारकों के अंतःकरण में भी भक्ति की सरिता उफनने लगी। देर तक भावसमाधि का अपूर्व वातावरण बना रहा। इस वातावरण की पवित्रता एवं दिव्यता में कोई व्याघात न करने पाये-इसके लिए हिमवान के महाशिखर शुभ्र-धवल परिधान पहने प्रहरियों की भाँति सन्नद्ध खड़े थे। वायु भी निस्पन्द हो चली थी। हिम पक्षियों का कलरव थम चला था। इस निस्पन्द एवं अविचल शान्ति की स्थिति में भी एक अपूर्व भक्ति चैतन्य प्रवाहित हो रहा था।
    
न जाने यह कालातीत, तुरीय स्थिति कब तक रही। हाँ! इतना अवश्य है कि उस वातावरण में गायत्री महामंत्र के द्रष्टा ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का स्वर सबसे पहले मुखरित हुआ। उन्होंने ही उदीयमान सूर्य के महाभर्ग को धारण करते हुए कहा-‘‘ऐसी अनुभूति हो रही है जैसी कि भक्त को चैतन्य का चिंतन करते हुए होती है तब वह स्वयं ही तद्रूप हो जाता है। जब तक विवेक नहीं जागता, तब तक जड़ता से मोह नहीं छूटता, तब तक किसी भी तरह भौतिकवादी-पदार्थवादी दृष्टि का परिष्कार नहीं होता। इसके बिना न तो आध्यात्मिक सोच बन पड़ती है और न ही परमात्म तत्त्व के प्रति समर्पण एवं प्रेम प्रस्फुटित होता है।’’
    
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का कथन उनकी चिंतन चेतना की कुछ ऐसी गहराई से प्रकट हुआ था कि सभी की सहमति एक साथ मुखर हो उठी। यहाँ तक कि हिमपक्षियों ने भी चहकते हुए अपनी सम्मति जतायी। महर्षि पुलह, क्रतु, वशिष्ठ आदि विशिष्ट जनों ने इस सत्य का समर्थन करते हुए कहा कि ‘‘दरअसल मनुष्य की समस्या ही यही है कि वह जड़ता से अतिशय मोहग्रस्त होकर स्वयं जड़ हो चला है। अब तो दशा यह बनी है कि वह चेतना के समाधान भी जड़ पदार्थों में ढूँढ़ता और खोजता है। इसी वजह से उसकी स्व-चेतना लुप्त और सुप्त हो चली है। यदि स्थिति से उबरना है तो उसे पुनः सभी जड़ पदार्थों व पाशों की व्यूहरचना से निकलकर पुनः चेतना के चैतन्य की ओर उन्मुख होना होगा। यही प्रक्रिया उसमें फिर से परम चेतना का प्रकाश उड़ेल सकती है।’’
    
महर्षि जनों के इस सम्पूर्ण वार्तालाप को देवर्षि बड़े ही धैर्य एवं स्थिरता से सुन रहे थे। उनकी दिव्य वीणा भी इस समय मौन थी। जबकि सबकी  अभिलाषा यही थी कि वह इस समय कुछ कहें, अपने नये सूत्र का मंत्रोच्चार करें। पर उन्हें इस तरह मौन देखकर ऋषियों में श्रेष्ठ क्रतु ने कहा-‘‘हे ब्रह्मपुत्र! इस समय आप मौन क्यों हैं? आपकी वाणी एवं वीणा ही आज के सत्र का प्रारम्भ करेगी।’’ उत्तर में देवर्षि के होंठों पर हल्का सा स्मित झलका। कुछ पलों के बाद उन्होंने कहा-‘‘मैं आप सबके विचारों पर चिंतन करते हुए सोच रहा था कि अरे! यही तो महर्षि शाण्डिल्य के मत में भक्ति है। ऐसा कहते हुए उन्होंने बड़े मधुर स्वरों में उच्चारित किया-
‘आत्मरत्यविरोधेनेति शाण्डिल्यः’॥ १८॥
अद्भुत और अभूतपूर्व है महर्षि शाण्डिल्य का मत। वे कहते हैं- ‘भक्ति है आत्मरति के अविरोधी विषय में अनुराग।’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ७८

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