मंगलवार, 8 जून 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग २९)

भक्त के लिए अनिवार्य हैं मर्यादाएँ और संयम

नमस्ते रुद्रमन्यवऽउतोतऽइषवे नमः॥
बाहुभ्यामुतते नमः॥ १॥
यातेरुद्रशिवातनूरघोराऽपापकाशिनी॥
तयानस्तन्वाशन्तमयागिरिशन्ताभिचाकशीहि॥ २॥

दुःख दूर करने वाले हे रूद्र! आपके क्रोध के लिए नमस्कार है, आपके बाणों के लिए नमस्कार है और आपकी दोनों भुजाओं के लिए नमस्कार है॥१॥ गिरिवर कैलाश पर रहकर संसार का कल्याण करने वाले हे रुद्र! आपका जो मंगलदायक, सौम्य, केवल पुण्यप्रकाशक शरीर है, उस अनन्त सुखप्रकाशक शरीर से हमारी ओर देखिए- हमारी रक्षा कीजिए॥२॥ इस वेदवाणी के मधुर मेघमन्द्र स्वरों से ऋषियों एवं देवों ने अपना शिवार्चन सम्पूर्ण करते हुए शिवरात्रि व्रत का पारायण किया।
    
सभी के मन में शिवभक्ति का मधुर गान गूंज रहा था। महर्षि पुलस्त्य ने इन भक्तिमय क्षणों में भक्ति की चर्चा छेड़ दी। वे बोले- ‘‘भक्ति का अर्थ सभी कालों में सार्थक है क्योंकि भावशुद्धि के बिना न तो विचार शुद्ध हो सकते हैं और न जीवन। भविष्य में जब भी मनुष्य की भावनाएँ भटकेंगी, बहकेंगी, उसका सारा जीवन भटकाव एवं बहकाव की डगर पर चल देगा।’’ महर्षि मरीचि उन्हीं के स्वरों में अपने स्वर को घोलते हुए बोले- ‘‘आप यथार्थ कह रहे हैं ऋषिश्रेष्ठ! भावनाओं को भी मर्यादा और संयम के तटबन्ध चाहिए। इनके अभाव में भावनाओं के पतन की आशंका बनी रहती है और यदि भावनाएँ पतित हुईं तो भला जीवन को पतन की डगर पर बढ़ने से कौन रोकेगा।’’ सभी ऋषिगण, सभी देव समुदाय इन दोनों महर्षियों की यह तत्त्वकथा सुन रहा था।
    
तभी नवसृष्टि का सन्देश देने वाले ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की दृष्टि देवर्षि की ओर गयी। वह भावों की गहरी समाधि में लीन थे। महर्षि की दृष्टि ने उन्हें प्रबोध दिया। वह किंचित सचेत हुए और मुस्कराते हुए कहने लगे- ‘‘हे ऋषिगण! मैं अब अपना अगला सूत्र सुनाता हूँ’’-
‘अन्यथा पातित्याशङ्क्या’॥१३॥
अन्यथा पतन की शंका बनी रहती है।
    
इस सूत्र का सत्य एवं मर्म यही है कि शास्त्र मर्यादाएँ एवं संयम के तटबन्ध में भावनाएँ सुरक्षित रहें अन्यथा पतन की आशंका बनी रहती है।

यह बात अनूठी थी परन्तु थोड़ी सी विचित्र एवं विलक्षण भी थी। पहली दृष्टि में कुछ ऐसा लगता था कि भक्ति की अलौकिकता पर मर्यादाओं के लौकिक बांध बांधे जा रहे हैं परन्तु चिन्तन की प्रगाढ़ता एवं गहनता में प्रवेश हो तो सच यही दिखाई देता है कि किसी को परमहंसत्व का स्वांग रचाने की जरूरत नहीं है। जब तक देह का बोध है तब तक मर्यादाएँ माननी ही चाहिए। हाँ! देहबोध ही न रह जाय, मन के द्वन्द्व ही न रहें, अस्तित्त्व ही भगवत्ता में विसर्जित हो जाए, तब की कथा अलग है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५८

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