सोमवार, 7 जून 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग २८)

शिवभक्त, परम बलिदानी दधीचि
    
तप-साधना, लौकिक-अलौकिक विद्याओं का अन्वेषण-अनुसंधान, अपने अंतेवासियों में इनका अध्ययन-अध्यापन यही इनका प्रमुख कार्य था। इसके अलावा वह गौतमी तट पर आश्रम बनाकर कुछ विशेष साधनाएँ सम्पन्न कर रहे थे। उस समय उनके पास कुछ विशेष अनुसंधानप्रिय छात्र ही थे। देवर्षि नारद अपनी स्मृतियों को ताजा करते हुए बोले-उस समय मैं गया था उन देवमानव के पास। अपनी अतिविशिष्ट साधना में लीन रहने के बावजूद वह मुझसे मिले। ओह! जितना सुरम्य-सुरभित उनकी आभा थी, उससे कहीं अधिक दिव्य वे स्वयं थे। देवमानव एवं अतिमानव होने के सभी लक्षण उनमें साकार थे।
    
तत्त्वचर्चा एवं भक्तिचर्चा करते हुए मैंने उनसे सहज पूछ लिया-हे महर्षि! आपकी साधना का साध्य क्या है? उत्तर में वह मुस्कराते हुए बोले-हे देवर्षि! मेरी साधना भी शिवभक्ति है और मेरा साध्य भी वही है। जब मैं समाधि में होता हूँ तो प्रतिपल-प्रतिक्षण मेरी भावचेतना का सरित प्रवाह उन भगवान भोलेनाथ की चेतना के महासागर में विलीन होता रहता है। उन कृपासिन्धु में मेरे अस्तित्व का बिन्दु विलीन-विलय होता रहता है और जब मैं जाग्रत होता हूँ तो समस्त प्राणियों में उन्हीं की अनुभूति करते हुए उनकी सेवा करता रहता हूँ। देवर्षि मेरा समस्त तप एवं सभी विद्याएँ लोकसेवा के लिए है। मेरे सभी कर्मों का सार मेरे आराध्य की सेवा है।
    
अपनी बातें कहते हुए उनका अस्तित्व भक्ति से भीग गया। वह बड़े विगलित स्वर में बोले- देवर्षि! मैंने अपने सम्पूर्ण जीवन में न तो धन कमाया है और न साधन जुटाये हैं। बस केवल तप किया एवं शिवभक्ति की है। यही मेरी लोकसेवा का माध्यम है। आपके जीवन की अंतिम चाहत क्या है ऋषिश्रेष्ठ?- मेरा यह प्रश्न सुनकर वह चिंतित हो उठे। उन्हें अपने अस्तित्व में कहीं कोई चाहत ढूँढे न मिली। उनका अस्तित्व तो शुभ्र-निरभ्र आकाश की भाँति हो गया था, जिसमें तप का पूर्ण चन्द्र प्रकाशित था। जिसमें अनगिन विद्याओं के तारकगण टके थे। चाहत और इच्छा की धुँध तो वहाँ थी ही नहीं।
    
फिर भी उन्होंने स्वयं को कुरेदा और बोल उठे-देवर्षि मैं चाहता हूँ कि मेरी चेतना ही नहीं मेरा शरीर भी लोकसेवा में लग जाये। उस दिन जैसे नियति स्वयं उनके मुख से बोल रही थी। उनके स्वयं के हृदय मंदिर में नित्य विद्यमान भगवान सदाशिव जैसे उन क्षणों में एवमस्तु कह रहे थे। कुछ वर्षों में ही उन महान् ऋषि का कथन साकार हो उठा। वृत्रासुर के आतंक से पीड़ित देवराज ने जब देवगणों के साथ जाकर उनसे उनकी अस्थियाँ माँगीं तो वे बोले- देवराज मैं धन्य हुआ। मेरी अस्थियाँ देवत्व के संवर्धन में लगेंगी। इनसे असुरता का विनाश होगा, इससे अधिक मेरे लिए और कोई सुयोग-सौभाग्य नहीं।
    
उन्होंने हँसते-हँसते अपने जीवन काल में अपनी अस्थियों का दान दे डाला। लोकसेवा के लिए इतना महान् बलिदान देने वाला धरती पर न कभी हुआ था और न होगा। बड़ी आसानी से उन्होंने योगबल से स्वयं की देह का त्याग कर दिया। उनकी अस्थियों से वज्र बना और असुरता का संहार हुआ। उनकी भावचेतना भगवान सदाशिव में विलीन हो गयी।’’ देवर्षि के मुख से यह भक्तिकथा सुनकर सभी ने हाथ जोड़कर भक्तश्रेष्ठ दधीचि एवं भगवान भोलेनाथ को प्रणाम किया और शिवरात्रि के अर्चन की तैयारियों में लग गये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५५

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