शुक्रवार, 4 जून 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग २७)

शिवभक्त, परम बलिदानी दधीचि
    
भक्त शमीक की भक्ति की अनुभूति ने सभी के भावों को छू लिया। इस अनूठी छुअन से पुलकित ब्रह्मर्षि विश्वामित्र कहने लगे- ‘‘अस्तित्व में सत्त्व की संशुद्धि हो तो भक्ति प्रगाढ़ होती है और यदि भक्ति प्रगाढ़ हो तो अपने आप ही कर्म प्रखर एवं निष्काम होते हैं। सच्चा भक्त कर्मों से नहीं, बल्कि कामना से मुँह मोड़ता है। उसकी जीवनधारा शास्त्र मर्यादाओं के तटबन्धों को कभी भी नहीं तोड़ती। उसके कर्मों का संगीत अपने आप ही मर्यादाओं की ताल के साथ संयुग्मित रहता है।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की इस ओजस्वी वाणी को सभी ने सहज आत्मसात् किया। हिमवान के उस दिव्य आँगन में सहज ही नवचेतना के स्पन्दन सघन हो उठे। पास में बहते झरने के स्वर हिमालय के शिखरों में रहने वाले हिम पक्षियों के कलरव के साथ युगलगान करने लगे।
    
बड़े अद्भुत क्षण थे यह। तभी ऋषि मार्कण्डेय ने वहाँ विद्यमान ऋषियों एवं देवों से कहा- ‘‘आज शिवरात्रि है, भगवान सदाशिव की अर्चना का महोत्सव है आज।’’ ऋषि मार्कण्डेय के इस कथन से ऋषियों के अंतःकरण में भक्ति की हिलोर उमड़ उठी। देवगण देवाधिदेव के मानसिक स्मरण में विभोर हो उठे। ऋषि पुलस्त्य भक्तिविह्वल होकर कहने लगे- ‘‘जीवन वही धन्य है जो शिवभक्ति में लीन रहे। जिसका प्रत्येक कर्म उपासना बना रहे।’’ पुलस्त्य ऋषि के कथन पर ऋषि मार्कण्डेय बोल उठे- ‘‘शिवभक्त महर्षि दधीचि ऐसे ही महान् भक्त थे। उनका समूचा जीवन भक्ति की अद्भुत गाथा बना रहा।’’
    
देवर्षि नारद ऋषियों की इस भक्तिचर्चा को सुन रहे थे। ऐसा लग रहा था कि जैसे वे इस भक्तिगान को अपने किसी नये सूत्र में पिरो रहे हों। था भी यही। उन्होंने अपनी मधुर वाणी में भक्ति का नया सूत्र उच्चारित किया-
‘भवतु निश्चयदार्ढ्यादूर्ध्वं शास्त्ररक्षणम्’॥ १२॥
भक्त को निश्चयपूर्वक-दृढ़तापूर्वक शास्त्र मर्यादाओं की रक्षा करनी चाहिए।
    
इस सूत्र की व्याख्या करते हुए देवर्षि बोले- ‘‘जो मुक्त है, उसका सबसे बड़ा दायित्व है कि अपने जीवन से वह शास्त्रों को प्रमाणित करे। भक्त के जीवन का सच यही है कि वह शास्त्रों को खण्डित नहीं करता, बल्कि उन्हें पूर्णता देता है।’’
    
ऐसा कहते हुए देवर्षि नारद कुछ पलों के लिए रुके। उनकी स्मृतियों के कोष में कुछ प्राचीन बिम्ब उभरने लगे। उनकी चेतना किसी प्राचीन किन्तु भव्य गीत को गाने के लिए आकुल हो उठी। इस आकुलता में ऐसा न जाने क्या हुआ कि सदा विंहसने वाले देवर्षि के आँसू छलक उठे। इस दृश्य ने सभी को चकित और विह्वल कर दिया। ऋषि पुलस्त्य ने उनसे पूछा भी- ‘‘ऐसा क्या याद आ गया देवर्षि, जिसने आपको भावाकुल कर दिया?’’ इस प्रश्न के उत्तर में थोड़े पलों के लिए मौन रहकर देवर्षि बोले- ‘‘हे ऋषिश्रेष्ठ! असुरता के नाश के लिए अपने जीवन का सहज दान करने वाले महर्षि दधीचि के जीवन प्रसंगों ने मुझे भावाकुल कर दिया।’’

‘‘देवर्षि! महर्षि दधीचि की भक्ति कथा आप ही सुनायें, क्योंकि आप उनके जीवन के कई सत्यों के सहज साक्षी हैं’’- ऋषियों के इस समवेत कथन से देवर्षि की चेतना में एक आध्यात्मिक आलोड़न हुआ। वह कहने लगे कि ‘‘मैंने ऋषि दधीचि को दारुण तप करते हुए देखा है। उनकी जीवन साधना तो उनके यौवन काल में ही शिखर पर पहुँच गयी थी। आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान तो उन्हें सहज प्राप्त था। भगवान सदाशिव उनके आराध्य थे। माता भवानी उन्हें अपनी संतान मानती थीं। सभी दिव्य शक्तियाँ, सिद्धियाँ, विभूतियाँ उनकी आज्ञा पाने के लिए लालायित रहती थीं। अनेकों अपरा और परा विद्याओं के वह प्रखर आचार्य थे। तप उनका सहज स्वभाव था। साध्य के सिद्ध हो जाने पर तप कम ही लोग करते हैं, और वह भी इतना दुष्कर और दारुण। पर महर्षि दधीचि का व्यक्तित्व ही अनेको असम्भव को सम्भव करने के लिए था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५४

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