मंगलवार, 15 जून 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ३२)

भक्त का जीवन निर्द्वंद्व व सहज होता है
    
देवर्षि की बात सुनकर ऋषि क्रतु ने हामी भरी। महर्षि पुलह ने भी सहमति में अपना सिर हिलाया। तभी हिमालय के आँगन में कुछ हिमपक्षियों की कलरव ध्वनि गूँजी और वातावरण थोड़ा और मुखर हुआ। गायत्री के महासिद्ध ब्रह्मर्षि विश्वामित्र इस सम्पूर्ण अवधि में प्रायः मौन रहे थे, इन क्षणों में उन्होंने भी कुछ कहने की उत्सुकता दिखाई। परमज्ञानी ब्रह्मर्षि को बोलने के लिए उत्सुक देखकर सभी शान्त हो गये। सम्भवतः सब ब्रह्मर्षि को सुनने के लिए उत्सुक हो उठे थे। सभी की इस अपूर्व उत्सुकता को भाँपकर देवर्षि ने स्वयं कहा- ‘‘आप कुछ कहें ब्रह्मर्षि! हम सभी आपको सुनना चाहते हैं।
आप महान तपस्वी एवं अनेकों गुह्य विद्याओं के ज्ञाता हैं, आपके स्वर को सुनकर सभी अनुग्रहीत होंगे।’’
    
‘‘सो तो ठीक है देवर्षि!’’ यह महान् ऋषि विश्वामित्र का स्वर था। वह कह रहे थे कि- ‘‘सभी प्रकार के तप एवं विद्या से भक्ति श्रेष्ठ है। इससे बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं। ऐसे ही एक परम भक्त आरण्यक मुनि के भक्तिमय जीवन का मैं साक्षी रहा हूँ। यदि आप सबकी सहमति हो तो मैं उनकी मधुर भक्तिगाथा की चर्चा करूँ।’’ ब्रह्मर्षि के इस आग्रह ने सभी को विभोर कर दिया। उनके इस कथन को सुनकर देवर्षि बोले- ‘‘आपको साधुवाद है ब्रह्मर्षि! हम सभी उन परम भागवत की गाथा सुनना चाहते हैं। आप अवश्य कहें, यह कथा प्रसंग सुनकर हम सभी धन्य होंगे।’’ देवर्षि की वाणी सभी को प्रीतिकर लगी और ब्रह्मर्षि विश्वामित्र अपनी अतीत की स्मृतियों में खो गये।
    
वह अतीत की इन यादों में भीगे हुए बोले- ‘‘उन दिनों मैं मिथिला के पास सिद्धाश्रम में तपोलीन था। अनेकों आध्यात्मिक आविष्कार मैंने इन्हीं दिनों किए थे। इसी समय मेरा आरण्यक मुनि से सम्पर्क हुआ। वह सिद्धाश्रम से थोड़ी ही दूर पर एक साधारण कुटी में निवास करते थे। मायावी राक्षसों-निशाचरों-दैत्यों की संघातक माया ने सभी ऋषियों-मुनियों, मनस्वियों व तपस्वियों को आक्रान्त कर रखा था। सभी भयाक्रान्त थे कि कब क्या हो जाय, कुछ पता नहीं। उन दिनों वन में कोई एकाकी रहने का साहस नहीं कर पा रहा था। सभी तपस्वी-यती समूह में रहना ही उचित समझते थे। अधिकतर जनों ने तो सिद्धाश्रम में आश्रय ले रखा था। इन्हीं में से किसी से मुझे पता चला कि मुनि आरण्यक निशाचरी माया के बीच एकाकी रह रहे हैं। उनके पास कोई भी अस्त्र-शस्त्र नहीं है, उनका न तो कोई रक्षक है न सहायक।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ६३

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