शुक्रवार, 11 जून 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ३१)

भक्त का जीवन निर्द्वंद्व व सहज होता है

देवर्षि के वचन सभी की कर्ण सरिता से प्रवाहित होकर हृदय सागर में विलीन होते गये। अद्भुत रस था प्रभु पार्षद नारद की वाणी में। कुछ क्षण को तो लगा कि सभी को भावसमाधि हो गयी परन्तु तभी महर्षि क्रतु ने चेताया-‘‘देवर्षि! ऐसा भी तो हो सकता है कि अंतर्चेतना भक्ति में इतनी भीग जाय कि लोक एवं वेद सब कुछ स्वयं ही बिसर जाय।’’ ‘‘हाँ, सम्भव है ऐसा’’, ब्रह्मर्षि पुलह का स्वर था यह। वह कह रहे थे कि ‘‘भावुकता जब भाव-महाभाव में परिवर्तित होती हुई परिपक्व प्रेम में प्रतिष्ठित होती है तो सभी विधि-निषेध खोने लगते हैं। आत्मबोध इतना प्रगाढ़ होता है कि देहबोध विस्मृत होने लगता है। भक्त भगवन्मय होता है, ऐसे में कैसे निभे आचारविधान? किस तरह से किए जाएँ कठोर कर्म?’’
    
पुलह के इस प्रश्न पर देवर्षि नारद का मौन टूटा। उनके हृदय से भक्ति की झंकार उठी और अधरों से फूट पड़ी। उन्होंने कहा-
‘लोकोऽपिपितावदेव किन्तु
भोजनादि व्यापारस्त्वा-शरीरधारणावधि’॥ १४॥
‘लौकिक कर्मों को तब तक (ब्रह्मज्ञान रहने तक) विधिपूर्वक करना चाहिए, पर भोजनादि कार्य, जब तक शरीर रहेगा, होते रहेंगे।’
    
इस सूत्र के उच्चारण के साथ देवर्षि ने ऋषियों एवं देवों की दिव्यता को निहारा और कहने लगे- ‘‘यह सूत्र पूर्व सूत्र का ही उत्तर भाग है। दोनों को एकीकृत करके समझना चाहिए। सच यही है कि नियम एवं मर्यादाओं की अवहेलना नहीं की जानी चाहिए। इन्हें अपने आप मनमाने ढंग से छोड़ देने पर पतन की आशंका बढ़ जाती है, परन्तु भावों में भीगी चेतना जब भक्ति में प्रतिष्ठित हो जाती है, तब ये सभी बाहरी आचार-नियम सहज ही छूट जाते हैं। हाँ, जब तक शरीर रहता है, तब तक भोजन आदि कर्म होते रहेंगे, क्योंकि इनके बिना शरीर की रक्षा सम्भव नहीं है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ६२

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 गुरु कौन

बहुत समय पहले की बात है, किसी नगर में एक बेहद प्रभावशाली महंत रहते थे। उन के पास शिक्षा लेने हेतु दूर दूर से शिष्य आते थे। एक दिन एक शिष्य न...